हम दोनो की
अच्छाई से
गुलशन महका,
मगर कुछ खामियाँ
हम दोनो की
तुम्हारी खंमियों को
तुमने खुशबू का नाम दिया
और मेरी खामियाँ
काटों का ताज
कैसे बन गयी ?…………..
हम दोनो की
फ़रवरी 7, 2012 at 6:41 पूर्वाह्न (Uncategorized)
समंदर किनारे
फ़रवरी 1, 2012 at 6:18 पूर्वाह्न (Uncategorized)
सितारों की..
जनवरी 29, 2012 at 7:19 पूर्वाह्न (Uncategorized)
यादों का छल्ला
नवम्बर 18, 2011 at 6:18 पूर्वाह्न (Uncategorized)
चांदनी सुना रही कुछ अनकहे से राज़
जो तेरे मेरे बीच में सजते थे बन साज़
कैसे कहूं पवन से ना छेड़े वही गुंजन
ना समझू कुछ जलता दिल में या उठती ठंडी सिरहन
चाँद भी नही खेलता बादलों संग आँख मिचोली
कहता नटखट कोई नही मैं तेरा हमजोली
इन बातों से खनकता तेरी यादों का छल्ला रुनझुन
फिर उठती अनगिनत लहरें ,विचलित होता ये मन……
खुद कभी पहल किया कीजिए
अक्टूबर 21, 2011 at 6:19 पूर्वाह्न (shayari, Uncategorized)
खुद कभी पहल किया कीजिए एक कदम
राह तो एक ही मंज़िल पर मिलेंगी हमारी
माना के कल ही बात हुई थी जैसे अपनी
ऐसा क्यूँ लगता है मुद्दत हुई तेरी आवाज़ सुने हुए….
कितने याद आते हो कभी
सितम्बर 26, 2011 at 6:42 पूर्वाह्न (Uncategorized)
कितने याद आते हो कभी
और लगते हो बहोत अपने से
कुछ बारिश में भीगे वो लम्हे
जब बरसते है मन के आंगन पर,
चलती हूँ मैं भी
खुली हरियाली पर दामन में
यादों को समेट कर
महसूस कर लेती हूँ उन्हे कुछ पल
निगाहों से निहार कर
उछाल देती हूँ,दव की बूंदों संग
मिल जाने के लिए
आज में वापास आने के लिए,
जानती जो हूँ तुम बहुत दूर हो अब कही………..
साज-ए-दिल
अप्रैल 7, 2011 at 5:50 पूर्वाह्न (Uncategorized)
मन की उथल-पुथल,लहेरे,हज़ारों ख्वाब , अनगिनत सितारो की बारात, मगर एक हसरत, एक ही ख्वाहिश
के तुम आओ ….
पहलेसा चुपके से पीछे से आकर , जकड़ो हमे, खुद की ,हमारी भावनाओ में भिगो और भिगाओ…
खामोशियाँ , तनहाईयाँ , आहटें और तेरी यादों के तराने इन सब को गहरी नींद सुलाओ…
बहुत कुछ कहना है दिल को, बेहद हसीन अरमान सजाए है उसने, उन्हे निभाने आओ…..
डरती हूँ कभी आवेश में आकर कुछ ज्यादा कह दिया और तुम बुरा न मान जाओ….
जैसे हमे कहना , वैसे तुम्हे भी कहना होगा कुछ, अपना दासता-ए-दिल सुनाओ…….
हम तुम मदहोश हो जाए,कोई साज-ए-दिल गुनगुनाओ…..
झर झर शाख से
अप्रैल 2, 2011 at 7:53 अपराह्न (त्रिवेणी)
झर झर शाख से झरती हुई पत्तियाँ
हर एक पे तेरा नाम लिखने की कोशिश करती हूँ
और तुम हसकर इसे हमारा बचपना कहते हो…..
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तोड़ी थी अनगिनत पत्तियाँ एक एक कर
उंगलियाँ भी दर्द से करहाती
तेरे प्यार की गहराई को नाप न सके मगर …….
गुलमोहर तुम्हे मेरी कसम
मार्च 20, 2011 at 5:45 अपराह्न (गुलमोहर)
गुलमोहर
तुम्हे मेरी कसम
सच सच बताना
तुम्हारे सलोने रूप की
छाव तले
जब शरमाई थी मैं
पहेली बार
क्या नही मची थी
केसरिया सनसनी तुम्हारे
मनभावन पत्तों के भीतर?
जब रखा था मैं ने
ज़िंदगी का पहला
गुलाबी प्रेम पृष्ट
क्या नही खिलखिलाई थी
तुम्हारी ललछोही कलियाँ?
गुलमोहर
सच सच बताना
जब पहली बार मेरे भीतर
लहरे उठी थी मासूम प्रेम की
तब तुम थे न मेरे साथ?
कितनी सिंदूरी पत्तियाँ
झरी थी तुमने मेरे उपर
जब मैं नितांत अकेली थी तो
क्यूँ नही बढ़ाया
अपना हाथ?
गुलमोहर
सच सच बताना
बस एप्रिल- मई में पनपते
प्यार के साथी हो?
जुलाइ-अगस्त के दिनो में
जब रोया मेरी आँखों का
सावन
तब क्यूँ नही आए
मुझे सहलाने?
गुलमोहर
सच सच बताना
क्या मेरा प्यार
खरा नही था?
क्या उस वक़्त तुम्हारा
तन हरा नही था,
क्या तब आकाश का सावन
तुम पर झरा नही था ?
कवियत्री – फाल्गुनी
(lokmat papar dec2010)
एक पुराना मौसम भीगा
जनवरी 20, 2011 at 5:30 पूर्वाह्न (Uncategorized)
Tags: kavita, mausam, mehek
दोस्तों में से ही किसीने ये कविता ईमेल से भेजी थी,हमे नाही कवी का नाम पता है,नाही ये कही और प्रकाशित हुई है क्या इस बात की कोई जानकारी ?बस मगर दिल को बहुत अच्छी लगी तो आप सब से बाट रहे है |
अगर किसी को इस कविता के लेखक के बारे में या और कुछ भी जानकारी हो जरूर बताए,आखिर सारा श्रेय उन्ही का है |
एक पुराना मौसम भीगा ,अनजानी बरसातों में
जाने लेकर कौन चला है , ओढ़ा बादल हाथों में |
इक मौसम में पतझड़ के दिन,इक मौसम में फूलों के
कितना सारा फर्क है आखिर ,तेरी ही सौगातों में |
अपनी आँखों में हर मंजर् , अब अनदेखा रहता है
कोई झील-मिल सी रहती है,ख्वाबों की बारातों में |
सब्र -आलम क्या होता है , यारो हम से पूच्छो तो
कतरा-कतरा शबनम चुनना, हिज्र की लम्बी रातों में |






