May 10, 2008 at 4:49 pm (हाइकू)
Tags: chai, haiku, hindi poem, kavita, man, mehek, mind, morning, mother, mothers day, subhah, tea

सुबह की पायल खनकते ही,निशा की गोद से उठकर
हम अक्सर उनकी गोद में समा जाते है | बिन कहे ही
वो कुछ ऐसी खुशबू ले आती है,की बस,दिल खुश हो जाता है |
उस खुशबू के बिना तो पैरों के पहिए चलते ही नही |
१ . चाय की चुस्की
तेरी हाथों से बनी
दिन सुहाना
उपरवाले ने भी ये ममता की मूरत बड़ी फुर्सत में बनाई होगी |
इतनी सहनशीलता,प्रेम,निस्वार्थ,त्यागी, और न जाने हमारे
एहसास उन तक मिलो दूर से भी कैसे पहुँच जाते है | दिल जान
लेता है , लफ़्ज़ों की ज़रूरत ही महसूस नही हुई कभी |
२ मेरे मन के
राज़ अनकहे से
कैसे समझी
सच ही तो कहते है जहा उपरवाला नही जा सका,उसने मा भेज दी |
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May 7, 2008 at 6:26 pm (Uncategorized)
Tags: hawa, hindi poem, kahi, kavita, kuch, mausam, mehek
कही कुछ तो
पहले तो हमे छूकर
गुजरनेवाला हवा का हर झोका
मधुर बातें कहता
पल पल की खबर देता
बावरा सा आगे पिछे
झूम झूम के बहता
अब पास से गुज़रे भी
बनता अनदेखा अनजाना
नाही कोई करता बहाना
खुलेआम नज़र अंदाज़ी
वजह नही मालूम
कही कुछ तो मौसम में
बदलाव आया है…
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May 3, 2008 at 7:21 am (shayari)
Tags: ajij, Blogroll, dua, khuda, mehek, mehhekk, shayari, sher, waqt
खुदा-ए-अज़ीज तेरे दर पे एक ही बड़ी चादर चढ़ाउँ तो काफ़ी होगी न
वक़्त के साथ तुझसे माँगनेवालों की दुआओं की फेहरिस्त लंबी होगी |
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May 2, 2008 at 5:03 pm (shayari)
Tags: aalam, aashiq, aasman, Blogroll, hindi poem, ishq, kavita, khamoshi, love, mehek, mehhekk, mohobbat, nagme, nazar, nazm, pyar, shayari, sher, tarannum
न जाने क्यों
वो ये कैसे सोच लेता है के
उसके हर जज़्बात हमारा दिल समझता है
साथ होकर भी तरन्नुम-ए-खामोशी का साज़
हमे हरदम नागवारा लगता है
कहेने को बीच में अनगिनत बातें राह देखती
वो बस कभी आसमान को कभी हमे तकता है
हालात-ओ-आलम बदलते नज़र नही आते
छेड़ो ना वही आलाप जो रूह में बसता है
न जाने क्यूँ डरती हूँ तुमसे आशिक़ -ए-हयात
अनकहा सा ये लम्हा रेत सा फिसलता है |
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May 1, 2008 at 6:00 am (Uncategorized)
Tags: Blogroll, death, life, mehek, rivival, zindagi
कुछ लोगो की टीम
ग्लव्स में खून से सने हाथ
महसूस करते है खून की गर्माहट को
किसी ज़िंदगी को बचाने की कोशिश
नब्ज़ की धीमी रफ़्तार,साँसों की उलझन
उसकी रुकती धड़कन मौत की सीढ़िया चढ़ती,
हमारी भागती धड़कन ,और तेज
होती है उसे पकड़ने के लिए
ऑक्सिजन,इनट्यूबेशन
ब्लड की लाइन,लाइफ सेविंग इंजेक्षन्स
सी.पी.आर,कारडीयाक शॉक्स
ए.सी.में छूटते पसीने
दस मिनट से आधे घंटे तक की ये लढाई
मौत से जीतने की कोशिश
किसी ज़िंदगी को महफूज़ रखने के लिए
उसके साथ पल पल मरती कई ज़िंदगियाँ
कभी कामयाबी मिलती है
कभी मौत का पलड़ा भारी
और सब खामोश….
अब तो आदत सी हो गयी है
मौत से दो हाथ करने की
वो हस कर ज़िंदगी ले जाती है
हर बार,अक्सर
और हमे सवेदना हीन बना जाती है
…
(
आज मौत का सामना पोस्ट पढ़ी,यूही ख़याल आया हम तो न जाने कितनी बार
,कभी कभी रोज इस पल का सामना करते है,न जाने कितनी बार मौत से लढ़ते है,
कभी जीत होती है,अक्सर हार भी,कबुल इंतना करते है की कोशिश जी तोड़ होती है,
जीत का जश्न भी होता है,मगर खामोशी का अफ़सोस करने के लिए शायद समय नही
होता,कोई और ज़िंदगी इंतजार कर रही होती है,और हम खुद को सवेदना हीन होने
का गुनहगार समझ कर आगे निकल जाते है | )
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April 29, 2008 at 6:31 am (Uncategorized)
Tags: Blogroll, hasya kavita, hasya vyanga, hindi poe, kavita, mahangai, mehek, mehhekk, nayi, rupiya, sabji, sabjimandi, saheli, shayari, sher, vyang
नयी सहेली
वक़्त मिला सोचा बाज़ार जाउँ
दो-चार दिन की सब्जी खरीद लाउँ
रास्ते में मिली नार नवेली
बातों बातों में ही बनी सहेली
फॅशनेबल,उँची एडी के सॅंडल
रहेन सहेन एक दम हाई फाई
मीठी ज़ुबान,दिल की अच्छी
बोली अब छूटेगी नही कभी
अपनी दोस्ती ये पक्की
हमे भी हुआ था बड़ा गुमान
उसकी मर्सीडीज़ में बैठे,बढ़ी अपनी शान
कितने आराम से सब्जी मंडी पहुँचे
मेमसाब को साथ देख
कभी ना पूछनेवाले भी
कहे बोलो मेडम आप क्या लेंगे ?
हम अपने बूढ़े काका के दुकान गये
पाँच अलग सब्जी के पचास रूपीए दिए
बेटा और एक पचास का नोट देना
अगर इतना सारा माल है लेना
मगर काका पिछले हफ्ते
के जैसा ही दिया पैसा
दुगुना दाम माँग रहे हमसे से ऐसा कैसा ?
नज़र उठाए काका बोले जानती हो
कौन है ये जो बला तुम संग लाई ?
बेटा इनका नाम है ” महँगाई ”
एक बार चिपकी अब ना छोड़गी
ये सुनते ही हमे फूटी रुलाई
और मेमसाब धीरे से मुस्कुराइ….
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April 26, 2008 at 6:12 am (मन पखेरू)
Tags: bhes, birhan, Blogroll, chitthi, dhadkan, fly, hindi poem, kavita, man, mehek, mehhekk, mind, mohobbat, pakheru, pravesh, sandes, shayari, sher, udna

मन पखेरू उड़ जा
मन पखेरू उड़ जा लै आ कोई संदेस
बरस पर बरस बीत रहे पिया भए परदेस |
मिलते ही उनसे ये कहना
तुझ बिन मुश्किल है अब रहना
दिल रे , तू धर ले उनकी धड़कन का भेस
मन पखेरू उड़ जा लै आ कोई संदेस |
यादों से भी हुई है अनबन
छोड़ गयी हमे बना के <