दो हाइकू

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सुबह की पायल खनकते ही,निशा की गोद से उठकर
हम अक्सर उनकी गोद में समा जाते है | बिन कहे ही
वो कुछ ऐसी खुशबू ले आती है,की बस,दिल खुश हो जाता है |
उस खुशबू के बिना तो पैरों के पहिए चलते ही नही |

 . चाय की चुस्की
    तेरी हाथों से बनी
     दिन सुहाना

उपरवाले ने भी ये ममता की मूरत बड़ी फुर्सत में बनाई होगी |
इतनी सहनशीलता,प्रेम,निस्वार्थ,त्यागी, और  जाने हमारे 
एहसास उन तक मिलो दूर से भी कैसे पहुँच जाते है | दिल जान 
लेता है , लफ़्ज़ों की ज़रूरत ही महसूस नही हुई कभी |

   मेरे मन के
    राज़ अनकहे से
    कैसे समझी

सच ही तो कहते है जहा उपरवाला नही जा सका,उसने मा भेज दी |

कही कुछ तो

कही कुछ तो

पहले तो हमे छूकर
गुजरनेवाला हवा का हर झोका
मधुर बातें कहता
पल पल की खबर देता
बावरा सा आगे पिछे
झूम झूम के बहता
अब पास से गुज़रे भी 
बनता अनदेखा अनजाना
नाही कोई करता बहाना
खुलेआम नज़र अंदाज़ी
वजह नही मालूम
कही कुछ तो मौसम में
बदलाव आया है

खुदा-ए-अज़ीज

खुदा--अज़ीज तेरे दर पे एक ही बड़ी चादर चढ़ाउँ तो काफ़ी होगी 
वक़्त के साथ तुझसे माँगनेवालों की दुआओं की फेहरिस्त लंबी होगी |

न जाने क्यों

 जाने क्यों

वो ये कैसे सोच लेता है के
उसके हर जज़्बात हमारा दिल समझता है
साथ होकर भी तरन्नुम--खामोशी का साज़
हमे हरदम नागवारा लगता है
कहेने को बीच में अनगिनत बातें राह देखती
वो बस कभी आसमान  को कभी हमे तकता है
हालात--आलम बदलते नज़र नही आते
छेड़ो ना वही आलाप जो रूह में बसता है
 जाने क्यूँ डरती हूँ तुमसे आशिक़ --हयात
अनकहा सा ये लम्हा रेत सा फिसलता है |

रिवाइवल

कुछ लोगो की टीम
ग्लव्स में खून से सने हाथ
महसूस करते है खून  की गर्माहट को
किसी ज़िंदगी को बचाने की कोशिश
नब्ज़ की धीमी रफ़्तार,साँसों की उलझन
उसकी रुकती धड़कन मौत की सीढ़िया चढ़ती,
हमारी भागती धड़कन ,और तेज 
होती है उसे पकड़ने के लिए
ऑक्सिजन,इनट्यूबेशन
ब्लड की लाइन,लाइफ सेविंग इंजेक्षन्स
सी.पी.आर,कारडीयाक शॉक्स
.सी.में छूटते पसीने
दस मिनट से आधे घंटे तक की ये लढाई

मौत से जीतने की कोशिश
किसी ज़िंदगी को महफूज़ रखने के लिए
उसके साथ पल पल मरती कई ज़िंदगियाँ
कभी  कामयाबी मिलती है 
कभी मौत का पलड़ा भारी
और सब खामोश….
अब तो आदत सी हो गयी है 

मौत से दो हाथ करने की
वो हस कर ज़िंदगी ले जाती है
हर बार,अक्सर
और हमे सवेदना हीन बना जाती है

(

 

 

 

आज मौत का सामना पोस्ट पढ़ी,यूही ख़याल आया हम तो  जाने कितनी बार
,
कभी कभी रोज इस पल का सामना करते है, जाने कितनी बार मौत से लढ़ते है,
कभी जीत होती है,अक्सर हार भी,कबुल इंतना करते है की कोशिश जी तोड़ होती है,
जीत का जश्न भी होता है,मगर खामोशी का अफ़सोस करने के लिए शायद समय नही 
होता,कोई और ज़िंदगी इंतजार कर रही होती है,और हम खुद को सवेदना हीन होने
का गुनहगार समझ कर आगे निकल जाते है | )

 

 

 

नयी सहेली

नयी सहेली

वक़्त मिला सोचा बाज़ार जाउँ
दो-चार दिन की सब्जी खरीद लाउँ
रास्ते में मिली नार नवेली
बातों बातों में ही बनी सहेली
फॅशनेबल,उँची एडी के सॅंडल
रहेन सहेन एक दम हाई फाई
मीठी ज़ुबान,दिल की अच्छी
बोली अब छूटेगी नही कभी
अपनी दोस्ती ये पक्की
हमे भी हुआ था बड़ा गुमान
उसकी मर्सीडीज़ में बैठे,बढ़ी अपनी शान
कितने आराम से सब्जी मंडी पहुँचे
मेमसाब को साथ देख 
कभी ना पूछनेवाले भी
कहे बोलो मेडम आप क्या लेंगे ?
हम अपने बूढ़े काका के दुकान गये
पाँच अलग सब्जी के पचास रूपीए दिए
बेटा और एक पचास का नोट देना
अगर इतना सारा माल है लेना
मगर काका पिछले हफ्ते 
के जैसा ही दिया पैसा
दुगुना दाम माँग रहे हमसे से ऐसा कैसा ?
नज़र उठाए काका बोले जानती हो
कौन है ये जो बला तुम संग लाई ?
बेटा इनका नाम है महँगाई ”
एक बार चिपकी अब ना छोड़गी
ये सुनते ही हमे फूटी रुलाई 
और मेमसाब धीरे से मुस्कुराइ….

मन पखेरू उड़ जा

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मन पखेरू उड़ जा

मन पखेरू उड़ जा लै  कोई संदेस
बरस पर बरस बीत रहे पिया भए परदेस |

मिलते ही उनसे ये कहना
तुझ बिन मुश्किल है अब रहना
दिल रे , तू धर ले उनकी धड़कन का भेस 
मन पखेरू उड़ जा लै  कोई संदेस |

यादों से भी हुई है अनबन
छोड़ गयी हमे बना के <