कितनी शिद्दत से

कितनी शिद्दत से उन्हे,दिल में बसाया
इज़हार-ए-मोहोब्बत के लिए , जरासा रुके थे
आँखों के सामने से,मेरा सरताज कोई और ले गया
सोचने की जिद्द में,अपनी ज़िंदगी खो चुके थे.

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