कितनी शिद्दत से उन्हे,दिल में बसाया
इज़हार-ए-मोहोब्बत के लिए , जरासा रुके थे
आँखों के सामने से,मेरा सरताज कोई और ले गया
सोचने की जिद्द में,अपनी ज़िंदगी खो चुके थे.
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December 12, 2007 at 2:39 am (shayari)
Tags: कितनी शिद्दत से, Blogroll, blogwani, dini poem, hindi, ishq, izhaar, mehek, mehhekk, mohobaat, poems, pyar, sartaj, shayari, sher, shiddat, sochna, zindagi
कितनी शिद्दत से उन्हे,दिल में बसाया
इज़हार-ए-मोहोब्बत के लिए , जरासा रुके थे
आँखों के सामने से,मेरा सरताज कोई और ले गया
सोचने की जिद्द में,अपनी ज़िंदगी खो चुके थे.
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