चँदनी रात है आभी जाओ

चँदनी रात है

नींबुआ के पीछे छुपा बैठा जो
मध्यम मध्यम मुस्कुराता रहता वो
मेरे सलोने चाँद से सजना
मैं हूँ कितनी पशेमा पशेमा
आज दिल की जमी पर, उतर कर आभी जाओ
चँदनी रात है , अपनी चँदनी तो बरसाओ |

फ़िज़ाए तुमको बुला रही है
रजनीगंधा भी महक रही है
बादलों के पर्दे ज़रा हटाओ
बहकता समा है,नज़र तो आओ
आज दिल की जमी पर, उतर कर आभी जाओ
चँदनी रात है,कोई माधुर रागिनी सूनाओ |

कल तुम चकोर बन जाओगे
अमावस पर गुम हो जाओगे
आज फिर पौर्निमा खिली है
चाँद से चँदनी मिली है
आज दिल की जमी पर, उतर कर आभी जाओ
चँदनी रात है,किरनो की बाहो में छुपाओ |

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3 Comments

  1. jinder said,

    December 20, 2007 at 1:47 pm

    beautiful

  2. mehek said,

    December 20, 2007 at 1:59 pm

    shukran jindarji

  3. Rewa said,

    February 15, 2008 at 2:03 am

    फ़िज़ाए तुमको बुला रही है
    रजनीगंधा भी महक रही है
    बादलों के पर्दे ज़रा हटाओ
    बहकता समा है,नज़र तो आओ

    Beautiful poem….chand ko bulana….bahut achhi ban pari hai.
    Chandni raten…sab jag soye…..


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