देखिए आप हमे चन्दा ना कहलाये
ये सुनकर आज कल हमसे पहले
वो आसमान का चाँद ही शरमाये
जो लफ्जे तारीफ आप हमारी करते हो
चाँद उनसे अपना दिल है बहलाए
शाम ढलते तुरंत ही प्रतीक्षा करता
ताकि आप उसे सबसे पहले नज़र आये
इसे जलन कहे या और कुछ पता नही
हम अपने दीवाने मन् को कैसे समझाए
हम इस उलझन में बावरे से फिरते
चाँद आपको हमसे कही दूर न ले जाये .
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दीपक भारतदीप said,
January 6, 2008 at 4:59 pm
करता है इशारा मन
और हम चल रहे हैं
जलता है मन
हम अपने को जलता समझ रहे हैं
चलते रहो इस जहाँ में मन के साथ
मत समझो के हम चल रहे हैं
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आपकी कविता देखकर यह पंक्तियाँ मेरे मन में आयीं जो आपके सम्मुख प्रस्तुत हैं
दीपक भारतदीप
mehek said,
January 6, 2008 at 5:14 pm
shukran deepakji,behad sahi panktiya hai,chalte raho jahan mein man ke saath,mat samjho hum chal rahe hai.aabhari hun,itni sundar panktiyon ke liye.
Shastri JC Philip said,
January 6, 2008 at 6:03 pm
“हम अपने दीवाने मन् को कैसे समझाए
हम इस उलझन में बावरे से फिरते
चाँद आपको हमसे कही दूर न ले जाये .”
बहुत अच्छा! भावनात्मक !!