हम तुम
अलग अलग
दो तन
एक मन
बाहों में
ये कंपन
हमारी तुम्हारी
बढ़ती धड़कन
हम फूल
तुम खुशबू
इन फ़िज़ायों संग
हो जाए रूबरू
हम घटा
तुम सावन
आओ बरस जाए
प्यासी धरती
तृष्णा मिटाए
हम दीप
तुम बाति
मिलकर जल जाए
प्यार की ज्योति
रोशन कराए
हम नींद
तुम ख्वाब
कर ले सारे
अरमान पूरे
कोई सपने
ना रहे अधूरे
हम सुर
तुम गीत
छेड़े साज़
सजाए प्रीत
एक धुन
बन जाए मीत
हम वफ़ा
तुम कसम
आज निभाए
ये रसम
होंगे ना जुदा
सजनी साजन
हम तुम
एक रंग
सदा रहे
संग संग.
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विनय प्रजापति said,
January 9, 2008 at 6:37 am
शब्द कविता बनकर सार्थक होते जान पड़ते हैं|
Rewa said,
January 25, 2008 at 11:34 am
Wonderful poem……I really liked it very much.
Aur sabse achhi lagi yeh lines….
हम तुम
अलग अलग
दो तन
एक मन
बाहों में
ये कंपन
हमारी तुम्हारी
बढ़ती धड़कन
rgds
loksangharsha said,
September 4, 2009 at 3:40 am
nice