ग़ज़लो की दीवानी

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   ग़ज़लो की दीवानी

आज कल पग पग निशानी
मैं बस ग़ज़ल सोचती जाउ
किसी पल तुम देखो मुझको
मैं बस ग़ज़ल तलाशती पाउ |

ना जाने ये कैसा खुमार है
मुझे इससे कब इनकार है
ग़ज़ल  बन रहा मेरा जीवन 
मुझे इससे अब इकरार है |

जिस गली भी लगा शामियाना
तखलूस हो रही ग़ज़ल जहा पर
कही और ढूँढने की नही ज़रूरत
मुझे भी तुम पाओगे वहा पर |

दिल से सुनती हूँ ग़ज़ल को
दिल से अपनाती हर लफ्ज़ को
भारी उर्दू अल्फ़ाज़ जो ना समझू
दिल से कोई अर्थ लगाती उनको |

हम तो बस इतना ही जानते
शेर जोड़ कर ग़ज़ल है बुनते
काफिया,बहर,मतला,रदिक
ये  सब हम  नही  समझते |

हम  भी  ये सब  सीखना चाहे
ताकि खालिस ग़ज़ल लिख पाए
हम भी खुदकी  महफ़िल सजाए
और ग़ज़लो की दीवानी कहलाए.|

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4 Comments

  1. विनय प्रजापति said,

    January 9, 2008 at 6:35 am

    हम तो बस इतना ही जानते
    शे’र जोड़ कर ग़ज़ल हैं बुनते
    काफ़िया,बहर,मतला,रदीफ़
    ये सब हम नही समझते |

    असलूब(नियम) निभाना कभी-कभी कितना मुश्किल होता है आपने बहुत ही सरल शब्दों में कह दिया|

  2. hemjyotsana parashar said,

    January 9, 2008 at 12:55 pm

    bahut khooob…………. mehhekk jee
    हम तो बस इतना ही जानते
    शे’र जोड़ कर ग़ज़ल हैं बुनते
    काफ़िया,बहर,मतला,रदीफ़
    ये सब हम नही समझते | ……. inhe ham bhi nahi samjhte par jaldi hi koshish karnge ke sab mil ke samjh paaye….

  3. mehhekk said,

    January 9, 2008 at 2:39 pm

    shukriya prajapati nazar ji,aap ki ghazale tho hamesha hi achhi hoti hai.kafi hamne padhi bhi hai.

  4. mehhekk said,

    January 9, 2008 at 2:42 pm

    hem shukran,hum bhi apke saath ye sikhna chati hai.hame intazaar rahega apke gazal par roushni dilanewale blog ka.aap likhe,hum rah mein ankhen bichoye baithe hai.

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