मंदिर होये मूरत,हृदय बसे भगवन
ये छोटिसी कहानी हमारी मा काफ़ी बार हम सारे भाई बहनो को दोहराती रहती है|
एक कस्बे में सुखी नामक बहू,अपने पति और साँस के संग रहा करती थी | उनकी
ईश्वर पर अटल श्रद्धा थी | लेकिन सांसजी को प्रभु पर कोई भरोसा ना था | किसी हादसे
वश वो अपना विश्वास प्रभु पर से खो चुकी थी | हालाकी पतीजी ईश्वर को मानते थे |
जब भी सुखी बहू ईश्वर का नाम स्मरण करने लगती,सांसजी टोक दिया करती|
गुस्सा हो जाती | सुखी बहू की जीवन में बस एक ही इच्छा थी,के पास के गाव जाकर,
वहा के हरी नारायण मंदिर के दर्शन करे,जो की काफ़ी जागृत देव स्थान माना जाता |
मगर अपनी नास्तिक साँस से कभी अनुमति नही माँग पाई |
एक बार पतीजी लंबे अरसे बाहर देश गये | सुखी बहू दिन भर काम करती,प्रभु को
याद करती,मिलने आने दो की रट सुनाती | सासू मा ने गुस्से में सुखी बहू को बँधवा दिया
पेड़ से,कस कर रस्सिया बँधी | सुखी को ना वो खाना देती ना पानी | ’अपने ईश्वर को
बुलाओ मद्दत के लिए ’ इतना ही कहती | सुखी भी नारायण का जाप करे जा रही थी |
आख़िर प्रभु को दया आही गयी सुखी पर |उन्होने पति का रूप धरा और पहुँचे,जहा
सुखी को बाँध रखा था | हालचाल पूछा,क्यों बँधा पूछा?सुखी ने प्रभु मिलन की इच्छा प्रगट की |
पति रूप में जो प्रभु थे बोले“ठीक है ,तुम सांसु मा को बिना बताए ही चली जाओ,तुम्हारी जगह
यहा हम रहेंगे,सब संभाल लेंगे| तुम जाओ और उस पत्थर की मूरत के दर्शन कर आओ |”
जैसे ही सुखी चली गयी,प्रभु ने सुखी का रूप धारण किया,खुद बँध गये,पेड़ से| सासू मा
समझती ,सुखी ही है,रोज ताने कसति उन पर.|प्रभु बस मिथ्या हंस पड़ते |
इधर सुखी बहू मूरत के दर्शन कर खुश हुई | पर पत्थर की मूरत में ,उसे भगवान का तेज
ना दिखाई दिया | कुछ गाववाले जो तीरथ से आए,उन्होने सुखी बहू मंदिर में होने की खबर
सांसुजी तक पहुँचा दी |
सांसुजीविश्वास ना करे,कहे सुखी तो पेड़ से ही बँधी है |लोग भी जाते, देख कर हैरान हो जाते |
सुखी बहू घर लौटी ,तो दो दो सुखी को देख कर सारे लोग भ्रम पे पड़ गये | दो नो कहती मैं
असली बहू हूँ | आख़िर हार कर असली सुखी बोली ’प्रभु अब खेल बस,मैं मंदिर दर्शन तो
कर आई,पर आप मुझे वहा नही मिले,बस आपकी मूरत थी ”.और रो पड़ी |
प्रभु प्रकट हुए बोले ” सुखी बहू,इसलिए तो हमने कहा था,जाओ और उस पत्थर के मूरत के
दर्शन करो,आरे जब हम यहा है,आपके मन में है,वहा कैसे मिलेंगे |”इतना कह चले गये |
प्रभु दर्शन पाकर सारे लोग धन्य हो चुके थे |सासुमा को भी अपनी ग़लती का एहसास हुआ|
सुखी बहू को भी समझ आगया के प्रभु,हर हृदय में बसते है | चाहे वो इंसान का हो या किसी
और प्राणी मात्र का | दिल से उन्हे याद करो,प्रभु ज़रूर भक्तो की पुकार सुनते है |
हमारी मा अक्सर कहती है,प्रभु से मिलना हो तो मदिर जाओ ही,मगर किसी की मद्दत करो|
किसीसे दो मीठे लफ्ज़ कहो.किसी और के लिए भी कभी दुआ करो ,किसी की खोई मुस्कान
लौटाओ,किसीकि तकलीफ़ समझो,प्रभु तुम्हे वही मिल जाएँगे |
कहा किस दिशा में खोजत
कौन राह तू करेगा भ्रमण
दर्शन की प्यासी अँखियाँ तोरी
कितना खर्च करे वो धन |
लालसा ये जन्मी है अंदर
प्रभु मिलन को तरसात मन
जानत नायी कौनू ठाव ठिकाना
इस चिंता मा झुलसत तन |
सारे जगत को भूले बिसरे
कर्म छोड़े,लगी ये अगन
प्रभु के गुण बखान करे
सदा रखिए खुद को मगन |
एसो ढूँढन से नाही मिलत
प्रभु का होत सुनिश्चित स्थान
मंदिर मा छबि होवे मूरत
हर जीव हृदय बसे भगवन |
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Rewa said,
फ़रवरी 26, 2008 at 3:55 पूर्वाह्न
Mujhe yeh bhajan kafi pasnd hai anup jalota ji ki hai…MAILI CHADAR ODHKE KAISE DWAR TUMHARE AAUN….kabhi sunna aap, you will like it veyr much. am listening now!
mehhekk said,
फ़रवरी 26, 2008 at 7:22 पूर्वाह्न
takhalus ke liye shukran rews ,jarur sunege ye bhajan hum.
Rewa said,
मार्च 6, 2008 at 4:37 पूर्वाह्न
महाशिवरात्रि आई, सुखो की रात्रि आई
मगन मन डोले रे, कहो बम भोले रे…!