कठपुतली का खेल

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जनमानस सब जिंदा तो है

पर मन की भावनाए मरी हुई

बाहरी काया ही आकर्षित करती

आत्मा दबी,जैसे कठपुतली सजी हुई

किसिका किसीसे ना कोई लेना देना

बस अपनी ताल में नाच नाचना

खुद के लिए ही भला सोचना

स्वार्थ के लिए दूसरे को बेचना

कोई मुसीबत में है तो क्या ?

राम जाने,उसका क्या हो,खुद बचना

जो है आज की दौलत का कुबेर धनी

उसके साथ ही दोस्ताना बनता अपना

जाने किस दिन वो सूरज निकलेगा

होगा इंसान से इंसान का सच्चा मेल

वरना तो धागो से बंधे नाच रहे

जीवन का ये कठपुतली का खेल.

7 Comments

  1. Rewa said,

    March 7, 2008 at 1:21 am

    जनमानस सब जिंदा तो है
    पर मन की भावनाए मरी हुई
    बाहरी काया ही आकर्षित करती
    आत्मा दबी,जैसे कठपुतली सजी हुई

    Bahut sahi likha hai!

  2. ghughutibasuti said,

    March 7, 2008 at 12:42 pm

    बहुत बढ़िया ।
    घुघूती बासूती

  3. anurag arya said,

    March 7, 2008 at 1:39 pm

    kuch jyada hiuds hai na. ye rachna …kuch gussa bhi hai …..man me…..

  4. विक्रम said,

    March 7, 2008 at 4:28 pm

    जाने किस दिन वो सूरज निकलेगा

    होगा इंसान से इंसान का सच्चा मेल

    सुन्दर आशा,अच्छी सोच

  5. mehhekk said,

    March 7, 2008 at 6:09 pm

    rews,ghughuti ji,anurag ji,vikram ji bahut bahut shukran

  6. paramjitbali said,

    March 7, 2008 at 6:40 pm

    रचना के भाव बहुत अच्छे हैं।बधाई।

  7. Rewa Smriti said,

    March 8, 2008 at 5:04 am

    Happy Woman’s day! :)

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