अमलतास के पुष्पित झूमर

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अमलतास के पुष्पित झूमर

ग्रीष्म ऋतु की खनकी पायल
गरम हवायें तनमन  घायल
तपती धरा,झुलसाती हर प्रहर
शाम सुहानी  या मीठी सहर
ज्वाला सी धग धगती दोपहर
सृष्टि पर जैसे टूटा कहर
राह पर मिल जाते हो तुम
लगते हो  सब से मनोहर
पीले सोनम से रंग सजे
अमलतास के पुष्पित झूमर
हरे पन्नो को त्याग  र 
ओढते हो ये लिबास
थकि आँखों को थोडासा हो
खुशनुमा सा हल्का एहसास
काया को नही मोहक सुगंध
जोड़े हो दिल से स्नेह बंध
खुद जले और बने दूसरे की छाया
वही बनता है तुमसा कुंदन
पास आकर तुम्हारे पग जाते ठहर
तुमसे सीखा है जीवन में
बनाना सयमि शीतल चंदन.

16 Comments

  1. Rewa Smriti said,

    March 31, 2008 at 7:08 am

    ग्रीष्म ऋतु की खनकी पायल
    गरम हवायें तनमन घायल
    तपती धरा,झुलसाती हर प्रहर
    शाम सुहानी या मीठी सहर
    ज्वाला सी धग धगती दोपहर
    सृष्टि पर जैसे टूटा कहर

    Very very lovely poem! This is also one of my fav flowers. My childhood school was decorated with this tres aur hamsab friends inke neeche khela karte the! You reminded my childhood days dear!

  2. mamta said,

    March 31, 2008 at 7:27 am

    महक बहुत ही प्यारी कविता है। क्या इत्तेफाक है की आज हमने अपने सवा सेर शोप्पेर पर भी गर्मी से जुड़ी पोस्ट लिखी है।

  3. ila said,

    March 31, 2008 at 1:33 pm

    महक, अमलतास मेरा और मेरी मां का अति प्रिय फ़ूल है.कविता तो सुन्दर है ही, उतना ही सुन्दर और मनोहर चित्र भी दिखाने के लिये धन्यवाद.

  4. March 31, 2008 at 1:33 pm

    प्यारी कोमल कविता और सुन्दर चित्र. बधाई.

  5. anurag arya said,

    March 31, 2008 at 2:53 pm

    adbhut…..aapki hindi bhi khoobsurat hai…urdu ki tarah.

  6. March 31, 2008 at 4:00 pm

    मौसम की इस अंगड़ाई पर
    यह शब्दों का चित्र मनोहर
    सचमुच ऐसे ही लगता है
    गुलमोहर के गालों पर
    ज्यों अमलतास का झूमे झूमर

  7. March 31, 2008 at 7:53 pm

    महक जी दिन पर दिन आप की कविता भी महल रही हे,बहुत सुन्दर.

  8. March 31, 2008 at 7:54 pm

    महक रही हे,बहुत सुन्दर

  9. mehhekk said,

    April 1, 2008 at 5:34 am

    aap sab ka bahut shukran sarahna ke liye

  10. alpana said,

    April 1, 2008 at 9:54 am

    bahut khuub!grami aa hi gyaee lagta hai!amaltass khil gaye :) .

  11. Tanu Shree said,

    April 2, 2008 at 9:43 am

    खुद जले और बने दूसरे की छाया
    वही बनता है तुमसा कुंदन
    पास आकर तुम्हारे पग जाते ठहर
    तुमसे सीखा है जीवन में
    बनाना सयमि शीतल चंदन.

    Very very beautiful mehekk…..

    God Bless You Dear!!

  12. shubhashishpandey said,

    April 2, 2008 at 4:54 pm

    sunder kavita

  13. April 3, 2008 at 7:24 am

    आपकी कविताएं मासूम और खूबसूरत होती हैं..कवि कुलवंत

  14. mehhekk said,

    April 5, 2008 at 4:43 pm

    alpanaji,tanu,shubhashiji,kulwantji bahut shukrana

  15. April 6, 2008 at 11:03 am

    सुन्दर रचना

  16. rawan said,

    October 8, 2008 at 9:05 am

    very very nice Kamal hai sir


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