समान विषमता
April 11, 2008 at 6:00 am (समान विषमता)
Tags: bachhe, beti, Blogroll, children, hindi poem, kavita, khilone, mehek, mehhekk, nagme, nazm, samaan, vishamata
समान विषमता
बापू और अम्मा का छोटा परिवार
एक बेटी एक बिटवा दो ही बच्चे हमार
कहते है सबसे दोनो को खूब पढ़ाएँगे
उँचे ओहोदे पर, दोनो को बिठाएँगे
बेटी क्या बेटा क्या हम को है समान
हमारे दो लाड़ले है इसका प्रमाण
सुन ओ ताया,सनरी ओ ताई
मुन्नी, बबुआ है जुड़वा बहेन भाई. |
बाज़ार से बापू जब लौटकर आए
साथ में ढेर सारे खिलौने लाए
बबुआ को अपने पास बुलाया
हाथों में उसके एक गुलेल थमाया
पीछे से मुन्नी की आवाज़ आई
बापू एक गुलेल हमका भी चाही
ये खेल हम भी खेलत है अच्छा
बबुआ से हमार नीशाना है पक्का
नही ये है लड़कन का खेल
तू लड़की देख तेरे लिए गुड़िया है लाई
मुन्नी, बबुआ है जुड़वा बहन भाई. |
घर में अचानक आए मेहमान
चल रे मुन्नी हाथ बटा बहुत पड़ा काम
बनानी रसोई,दिया क्या सुनाई
अम्मा मुन्नी पर ज़ोर से चीलाई
दौड़ दौड़ के मुन्नी जल्दी से आई
बबुआ को संग बुला अम्मा काम जल्दी निबट जाई
परीक्षा चल रही उसको करने दे अभ्यास
अव्वल नंबर लाने उसको करना है सराव
कल गणित का पर्चा मेरा ,फूटी मुन्नी की रुलाई
मेरी भी तो अम्मा रही अधूरी पढ़ाई
मुन्नी,बबुआ जुड़वा बहेन भाई. |
सोचती मुन्नी कैसे है ये आधुनिक विचार
अपनो से पाया उसने दोगला व्यवहार
समानता का बस उपर उपर का कहलावा
आधुनिकी करण का कैसा ये दिखावा ?
हम पर कित्ते बंधन,बबुआ को क्यूँ है छूट
नन्हा सा मन अपनो से गया रूठ
लाडली हूँ घर की,फिर भी बोलत हो पराई
ये समान विषमता घर में हर बेटी ने पाई
मुन्नी ,बबुआ जुड़वा बहेन भाई. |




anurag arya said,
April 11, 2008 at 6:07 am
khari bat…..kahne ka andaj juda hai……
rasprabha said,
April 11, 2008 at 6:15 am
ये अंतर कभी नहीं मिटेगा महक जी ,
इस अंतर के दर्द को बहुत बारीकी से प्रस्तुत किया,
मन पर गहरा प्रभाव डाला है आपने………
ila said,
April 11, 2008 at 6:58 am
अच्छा प्रयास महक ! धीरे धीरे ये अन्तर ज़रूर मिटेगा, हां गांवों में मुश्किल लगता है.
shubhashishpandey said,
April 11, 2008 at 9:00 am
Sunder rachna, samaj ke prati apne kartavyo ke liye ek kavi hriday ka ye vo ehsas hai jo auro ko bhi unke kartvo ka ehsas karata hai.
jaisa ki kahte hain raat lambi ho sakti hai par khtam to use bhi hona hota hai , aaj nahin to kal badlega jarur, jarurat hai to bas har kisi ko apni jimmedari nibhane ki ,
sunder abhivyakti
mehhekk said,
April 11, 2008 at 11:34 am
anurag ji,rashmi ji,ilaji,shubhashiji bahut bahut shukrana,ye saman vishamata badle gi ya nahi hame nahi pata,shayad badlegi,magar aur kitni sadiya lage,shayad kahi badal bhi gayi hogi uska gyan nahi,
दीपक भारतदीप said,
April 11, 2008 at 4:07 pm
बहुत भावपूर्ण रचना
दीपक भारतदीप
राज भाटिया said,
April 11, 2008 at 4:34 pm
महक बहुत ही सुन्दर रचना ओर आज का सच *सोचती मुन्नी कैसे है ये आधुनिक विचार
अपनो से पाया उसने दोगला व्यवहार
menka said,
April 11, 2008 at 8:17 pm
कविता बहुत अच्छी है| मुझे तो लगता है जो भी कहते है की हमारे लिए लडके लड़की मे कोई फरक नही है उनके मन के किसी कोने मे ये बात जरुर रहती है की “है…फरक तो है ही” but I appreciate your feelings.
Rewa Smriti said,
April 12, 2008 at 7:04 am
पीछे से मुन्नी की आवाज़ आई
बापू एक गुलेल हमका भी चाही
ये खेल हम भी खेलत है अच्छा
बबुआ से हमार नीशाना है पक्का
kitna bhavpurn hai beti ka yeh request! You know mehek dadimaa used to call me by this name.
mehhekk said,
April 12, 2008 at 11:48 am
deepak ji,raj ji shukran
menkaji,shukran sahi kaha,man ke andar kahi to hota hi hai,beti hai ye.
rews thank u,to aap apni dadi maa ki ladli si munni hai,nice:)
kmuskan said,
April 12, 2008 at 12:22 pm
बहुत सुंदर रचना है और आज के आधुिनक जीवन पर िबलकुल िफट बैठती है। हम िजतना आगे की ओर बढ रहे है उतना ही हमारे समाज का दोगलापन भी बढ रहा है।