किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ

देखा नज़र भर के तुझे जमाना हुआ
हमारी रुसवाईयों का सबब पुराना हुआ |
हम कब के भुला चुके तीर-ए-नश्तर
नफ़रत-ओ-गुबार दिल से रवाना हुआ |
दुनिया की दौड़ में हो गया शामिल
इंसान खुद की शख्सियत से बेगाना हुआ |
वो तो यूही किसीने जिक्र किया तुम्हारा
छुपाए राज़-ए-इश्क़ तब बताना हुआ |
मुश्किल गलियों से तेरी दहलीज़ तक पहुँचे
दीदार-ए-आफताब नाहो साजिशन सताना हुआ |
रस्मो की जंजीरे तोड़ के निकले जो
राह-ए-वफ़ा तय उनका गुजर जाना हुआ |
यादों और ख्वाबो में मिलने आओगे कभी
फ़िज़ूल ही झिलमिल अरमानो को बहलना हुआ |
सच्चाई को गले लगाना सिख ले “महक”
किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ |

 

 

 

 

 

 

5 Comments

  1. April 16, 2008 at 7:27 pm

    sub’haan allah, kamaal kaa likha hai….

  2. menka said,

    April 16, 2008 at 10:53 pm

    bahut achha likha hai aapne.

  3. Rewa Smriti said,

    April 17, 2008 at 2:07 am

    दुनिया की दौड़ में हो गया शामिल
    इंसान खुद की शख्सियत से बेगाना हुआ |

    सच्चाई को गले लगाना सिख ले “महक”
    किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ |

    Beautiful afsana likha hai :)

  4. mehhekk said,

    April 17, 2008 at 5:21 am

    nazar ji,menka,rews shukrana

  5. kmuskan said,

    April 17, 2008 at 11:02 am

    bahut badiya hai


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