बादल मितवा

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राह देखे मन प्रतिपल हर क्षण
ढूँढे तुझे मेरा बिखरा कन कन

नही सुने जाते जमाने के ताने
उस पर  आने के तेरे लाख बहाने

आँखें है बंजर ,कैसे नीर बहाए
सुलगती किरने आकर तनमन जलाए

तुझसे मिलने करूँ सागर का मंथन
धरा हूँ , मुझे है उड़ने का बंधन

ब्रम्‍हांड में पूरे तेरा है विस्तार
मुक्त अकेला ही करता है विहार

सुन रहे हो क्रंदन मत सता रे
कुछ लम्हो की साँसे अब तो आरे

मोहोब्बत का वास्ता तुझे धड़कन पुकारे
बादल मितवा प्यार की बूंदे बरसा रे.

4 Comments

  1. Rewa Smriti said,

    April 19, 2008 at 8:06 am

    ब्रम्‍हांड में पूरे तेरा है विस्तार
    मुक्त अकेला ही करता है विहार

    Very beautiful mehek…..
    School mein padhi ek poem yad aa gayi ‘badal ko ghidte dekha hai!’

  2. mehhekk said,

    April 19, 2008 at 11:05 am

    rews shukran

  3. anurag arya said,

    April 19, 2008 at 1:24 pm

    मोहोब्बत का वास्ता तुझे धड़कन पुकारे
    बादल मितवा प्यार की बूंदे बरसा रे.

    रोज रोज कहाँ से लेकर आती है ..मोहतरमा….

  4. mehhekk said,

    April 19, 2008 at 4:09 pm

    anuragji shukriya,roz roz dil ki kalam se :)

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