तेरे वजूद का एहसास
April 26, 2008 at 4:02 am (Uncategorized)
Tags: badal, barish, Blogroll, ehsas, hindi, jeevan, laughter, lehre, life, mehek, mehhekk, mukhmandal, muskan, pani, shehra, smile, vajud, water, zindagi
अपने आप में खोई,अकेली ही खड़ी थी | न जाने किस सोच में डूबी थी |
लंबे घने गेसुओं को उसकी ,बहती हवा भी छूने को मचल पड़ी | कभी यूही
ल़हेरा के छोड़ देती,कभी एक लट का टुकड़ा उसकी मुख मंडल पर रख देती |
मगर वह ईन अटखेलियों से जुदा बनी रही | जान बुझ कर या अनजाने में
शायद उसे भी नही पता था |
सूरज की गुनगुनी धूप में उसका चहेरा जगमगा तो रहा था,मगर उस पर कोई
भाव नही परावर्तित हो रहे थे | लगा एक कदम आगे बढ़कर क्यूँ न गुफ्तगू कर ले |
उसकी तल्लिनता भंग करने का साहस नही जुटा पाई | क्या वह खूबसूरत तराशा
हुआ बुत मात्र है,जो जीवित हो कर भी सवेदना हीन होती है | नही ऐसी तो कोई बात
नही लग रही |
चाहे उसपर किसी और बात का असर न हो रहा हो,बदलते रुत का,मौसम के
रुख़ का असर हो रहा था | जैसे उसके दिलदार का पैगाम हो उन में,और वह हर
बात सुनकर ,मुख की बदलती रंग छटा से उसका जवाब दे रही हो |
कही से अचानक ही रुई से लबालब बादल इकट्ठा होने लगे थे | उसके मुख की
रेखायें तनी सी खीची सी लगने लगी | हल्का गुलाबी गोरा रंग उनके काले स्याह
रंग में घुल गया | कुछ ज़ोर ज़ोर की आवाज़े और उसका बढ़ता तनाव,जैसे
सारे जहाँ की चीता में डूब गयी हो | ज़्यादा देर नही चला ये सब,किसी ने रुई की
फाहो को निचोड़ दिया होगा | उस में भरा पानी छम छम करता धरा की गोद में बहने
लगा | पैरों के नीचे से गुज़रते ठंडे स्पर्श ने उस पर सम्मोहन सा जगाया ,या सवेदना
का चुबक लगाया न जानू | वह मदहोश सी मुस्कुरा उठी |
जब बादलों के पर्दों से किरनो का रथ निकला ,सारी सृष्टि पाचू के रंग सज गयी |
सुरभी के सुवास से मन पटल के द्वार खोल दिए | गगन का इंद्रधनु पूरे क्षितिज पर
बिखर पड़ा | फूलों पर जमी बूँदों में खुद को निहारती वह खिलखिला कर हस दी |
उसके हर बदलते रूप और भाव के साथ मैं भी जुड़ गयी थी अब तक | साथ कुछ पल
का ही ,एक रिश्ते में बदल गया हो जैसे | वो जैसी भी है मैं ने अपना लिया उसे | कभी
मासूम बच्चे सी ज़िद करती है,कभी अल्लड़ सी दौड़ती है,कभी समझदारी की बातें भी
करती है | वो है तो मेरा ही हिस्सा | तुमसे मुझे प्यार है नाआशना | ज़िंदगी मुझे
तेरे वजूद का एहसास है अभी |





Rewa Smriti said,
April 26, 2008 at 4:29 am
ज़िंदगी मुझे तेरे वजूद का एहसास है अभी |
Sahi kaha hai Mehek. Jab tak ragon mein lahu dourta hai tabtak zindagi ka wazood hai….aur uske baad to sab kuch mitti mein mil jata hai….kahte hein na naam gum jayega…chehra yeh badal jayega….meri aawaz hi pahchan hai ger yaad rahe….
mehhekk said,
April 26, 2008 at 5:01 am
rews shukrana,bahut sahi kaha aapne,jab tak zindagi hai,tho hai,varna mitti,gana bhi ekdam sahi is situation ke liye
azad said,
April 26, 2008 at 5:40 am
Rewa ji lahu dourta hai dourti nahin hai. word wajood hai wazood nahin hai.
azad
Rewa Smriti said,
April 26, 2008 at 10:32 am
Mehek, plz correct the typo mistake…..aur wazood sahi hai…use waise hi rahne dena.
Azadji, wazood-वज़ूद. i know this is correct. thnx
mehhekk said,
April 26, 2008 at 10:56 am
rews ligiye sahi kar diya,:):)type mistake tho hamse bhi ho jati hai:)
दीपक भारतदीप said,
April 26, 2008 at 3:06 pm
दर्शनीय चित्र के साथ विचारणीय चिंतन
दीपक भारतदीप
mehek said,
April 27, 2008 at 3:33 am
shukrana deepak ji
ami said,
April 27, 2008 at 6:36 am
I love the picture u added Mehek.
Very lovely and embellishly written
mehek said,
April 28, 2008 at 3:48 am
ami ji shukrana
shubhashishpandey said,
April 28, 2008 at 5:01 am
bahut khub , aap to roz roz nayi vidhao se apni lekhni ka parichay karva rahi hain
meri shubhakamnayen aap ki is kavya - yatra ke liye
mehhekk said,
April 28, 2008 at 5:00 pm
shubhashi ji sneh aur shunhkamnao ke liye bahut shukrana.