तुमसे हूँ मैं और मुझसे हो तुम – ज़िंदगी

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तुमसे हूँ मैं और मुझसे हो तुम वरना तो सब अधूरा 
यही लफ्ज़ बार बार मूड कर हमसे ज़िंदगी कहेती है | 

 

 

सुनो तुम मेरा गीत और मैं तुम्हारी धड़कन में बस जाउँ
बन जाए ऐसी धुन जिस में जीवन की नदिया मिलती है | 

 

 

साँसों में उसकी खुशबू घुली सी , ज़ुबान पर बन मिठास
आँखों में नमकिन सा पानी का झरना बन के रहती है | 

 

 

वैसे  कदम से कदम मिलाकर चलती ,पल पल का बंधन
जब  ज़रूरत महसूस होता साथ,तो  नज़रों से छिपती है | 

 

 

पशेमा पशेमा हो ये मन ढूंढता है उसे अंधेरो उजालो में
किसी कोने से झाकति ,मंद मुस्काती खिलती,बहती है |

 

 

 

 

 

 

 

 

14 Comments

  1. June 18, 2008 at 9:08 am

    bahut khoob : Rohit Tripathi

  2. June 18, 2008 at 5:20 pm

    बहुत बढिया कविता है। आपकी कविताओं में अब जो दार्शनिक भाव दिखता है वह दिल का छू जाता है।
    दीपक भारतदीप

  3. mehek said,

    June 18, 2008 at 5:30 pm

    rohit ji,deepak ji bahut shukran

  4. ashutosh said,

    June 19, 2008 at 1:05 am

    i am not impressed byyour poem.but it’s ok.

  5. June 19, 2008 at 4:43 am

    sunder rachna,aasha karti hu jindgi k bare me hi he.aatisunder.

  6. mehek said,

    June 19, 2008 at 5:55 am

    ashutosh ji , rashmi ji shukrana,ji zindagi ke baarein mein hi hai :)

  7. कुश said,

    June 19, 2008 at 6:49 am

    अच्छा लिखा है आपने महक जी.. एक और बात मुझे आपका ई-मेल आई डी चाहिए यदि संभव हो तो दीजिएगा मेरे पते पर – bhaikush@gmail.com पर.. आभार

  8. Rewa Smriti said,

    June 19, 2008 at 9:24 am

    सुनो तुम मेरा गीत और मैं तुम्हारी धड़कन में बस जाउँ
    बन जाए ऐसी धुन जिस में जीवन की नदिया मिलती है |

    Good one!

    Indono panktiyon ko padhkar mujhe meri hi poem yaad aa gayi…neeche dal rahi hun!

    तुम सुनो वो लफ्ज़ हूँ
    ना समझो तो राज़ हूँ
    गुनगुनाती जो भी आज
    तेरे धड़कन में छुपी
    एक अनोखी, राग हूँ! :)

  9. kanchan said,

    June 19, 2008 at 11:37 am

    पशेमा पशेमा हो ये मन ढूंढता है उसे अंधेरो उजालो में
    किसी कोने से झाकति ,मंद मुस्काती खिलती,बहती है |

  10. mehhekk said,

    June 19, 2008 at 2:25 pm

    kush ji,rews,kanchan ji shukrana

    rews aapki ye kavita hame yaad hai,bahut sundar panktiyan shukrana

  11. alpana said,

    June 22, 2008 at 12:03 pm

    साँसों में उसकी खुशबू घुली सी , ज़ुबान पर बन मिठास
    आँखों में नमकिन सा पानी का झरना बन के रहती है |

    kya virodhabhaas hai..lekin yahi to hai zindagi..

  12. rohit said,

    June 26, 2008 at 4:15 pm

    well
    again a good poem.
    rohit

  13. Raghvendra Chourasia said,

    July 22, 2008 at 8:30 am

    It is really a nice poem. The best part of this peom, Which I liked is :-

    पशेमा पशेमा हो ये मन ढूंढता है उसे अंधेरो उजालो में
    किसी कोने से झाकति ,मंद मुस्काती खिलती,बहती है |

  14. meena said,

    December 1, 2008 at 9:54 am

    hi……………..


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