बरसाती ख़याल कुछ यू भी

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मेघा आज फिर टुटके बरसे तुम मीत से
माटी से ‘महक’ ऊठी , इश्क में सराबोर निकली |

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ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली |

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मौसम खुशनुमा , फ़िज़ायें भी ‘महक’ रही
तेरा नाम क्या लिया, फूलों की बरसात हुई |

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सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
बूंदो  के झुमके  पहन भीग रही छत पे |

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बारिश की लड़ी से नव पल्लवित रैना
इंद्रधनु के रंग उतरे ‘महक’  के  नैना |

37 Comments

  1. July 17, 2009 at 7:18 pm

    ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
    सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली |

    –वाह, ऐसी दीवानगी..देखी नहीं कहीं. बहुत उम्दा!!

  2. विनय said,

    July 18, 2009 at 2:15 am

    बहुत ख़ूबसूरत अशआर हैं

    पढ़िए: सबसे दूर स्थित सुपरनोवा खोजा गया

  3. रंजन said,

    July 18, 2009 at 5:09 am

    बहुत खुब.. यही मौसम का असर है.. अच्छा लगा..

  4. July 18, 2009 at 5:46 am

    फूल का चित्र भी बहुत ही सुंदर है.

  5. preeti tailor said,

    July 18, 2009 at 7:28 am

    bhige bhige alphazonne hamen bhigo diya ,
    tumhari mahak ko ham tak bhi pahunch diya ….

    adbhut ahesaas

  6. rashmi prabha said,

    July 18, 2009 at 7:42 am

    ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
    सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली |
    subhanallah

  7. om arya said,

    July 18, 2009 at 8:58 am

    GAZAB KI ABHIWYAKTI HAI AAPKI…….KHUBSOORAT

  8. July 18, 2009 at 10:49 am

    क्या कहूं? बस यही कह पाऊंगा कि बहुत ही खूबसूरत लफ़्ज हैं. शुभकामनाएं.

    रामराम.

  9. "रज़िया" said,

    July 18, 2009 at 12:25 pm

    मेघा आज फिर टुटके बरसे तुम मीत से
    माटी से ‘महक’ ऊठी , इश्क में सराबोर निकली |
    सुं………….द……….र……….मन भीग गया महकजी!!! वाह! लाजवाब!

  10. ranju said,

    July 18, 2009 at 2:30 pm

    मौसम खुशनुमा , फ़िज़ायें भी ‘महक’ रही
    तेरा नाम क्या लिया, फूलों की बरसात हुई |

    बहुत खूब बहुत सुन्दर लिखा है आपने महक

  11. दीपक said,

    July 18, 2009 at 6:02 pm

    बहुत सुन्दर, मजा आ गया।

  12. July 18, 2009 at 10:48 pm

    ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
    सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली |

    waah..
    waah..
    waah..
    bas yahi kah paaye ham…

  13. सुनीता शानू said,

    July 19, 2009 at 2:02 am

    महक बहुत अच्छी लगी रचना, बारिश की बूँदो का इतना सजीव चित्रण मन को भा गया…
    सबसे खूबसूरत…
    बारिश की लड़ी से नव पल्लवित रैना
    इंद्रधनु के रंग उतरे ‘महक’ के नैना

  14. Urmi said,

    July 19, 2009 at 5:00 am

    बहुत ही ख़ूबसूरत और लाजवाब लिखा है आपने !

  15. Razi said,

    July 19, 2009 at 8:13 am

    सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
    बूंदो के झुमके पहन भीग रही छत पे |

  16. Razi said,

    July 19, 2009 at 8:13 am

    behtareen likha hai lajawaab

  17. July 19, 2009 at 9:17 am

    badhiyaa rachanaa hai. yoon hee likhatee rahen.

  18. Syed Akbar said,

    July 19, 2009 at 10:59 am

    सावन में पूरी तरह सराबोर…. सुन्दर

    तस्वीर भी बहुत सुन्दर है.

  19. digamber said,

    July 19, 2009 at 3:34 pm

    ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
    सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली

    यूँ तो हर शेर अपने आप में बरखा की एक बुहार है…………. सावन की झंकार है……….. पर इस शेर नें सारी हद्दें पार कर दी हैं…………. लाजवाब

  20. adwait said,

    July 19, 2009 at 4:54 pm

    तेरा नाम लिया फूलों की बरसात हुई। बहुत खूब लिख है आपने।

  21. ramadwivedi said,

    July 19, 2009 at 5:03 pm

    ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
    सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली

    बहुत खूब महक जी..हर शेर में महक की महक आ रही है…..इसी संदर्भ में अपनी कुछ पंक्तियाँ आपके लिए प्रेषित हैं…..

    दीवानगी है दिल की यह,दिल्लगी नहीं,
    दीवानगी जो होश उड़ाती चली गई,
    तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई।

    डा. रमा द्विवेदी

  22. mithilesh dubey said,

    July 20, 2009 at 2:46 am

    बारिश की लड़ी से नव पल्लवित रैना
    इंद्रधनु के रंग उतरे ‘महक’ के नैना |

    bahut khub bahut sunder bhav hai.

  23. July 20, 2009 at 5:34 am

    Bahut khub likha hai.Badhai.

  24. July 20, 2009 at 5:54 am

    Wah…भाव-प्रभाव बेहतरीन.. साधुवाद….

  25. July 20, 2009 at 6:24 am

    सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
    बूंदो के झुमके पहन भीग रही छत पे |

    वाह…वाह….
    “बूंदों के झुमके” बिल्कुल नया प्रयोग।
    बधाई!

  26. July 20, 2009 at 3:58 pm

    wah,
    shabdo ki is barsat me savan ka aanand ..lazavab he ji.

  27. Alpana Verma said,

    July 21, 2009 at 8:08 am

    सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
    बूंदो के झुमके पहन भीग रही छत पे |

    waah! kya baat hai Mahak!

    baarishon ke khoob maje liye jaa rahe hain??

    bahut sundar panktiyan likhi hain…

    aur tasveer bhi jaandaar!
    bahut hi sundar post hai..

  28. July 21, 2009 at 9:58 am

    ये बारिश तो महज़ बहाना है….मुझे तो लगता है कि महक बरसी है…पूरे रंग में….महक बरसी है…भीगे उमंग में…तो ऐसे ही बरसो महक…ताकि ये साहित्यिक सुगंध हर रचनाकार तक पहुंचे…

  29. vishnu said,

    July 21, 2009 at 2:39 pm

    kya baat hai….

  30. Poonam said,

    July 21, 2009 at 4:36 pm

    सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
    बूंदो के झुमके पहन भीग रही छत पे |
    बारिश की लड़ी से नव पल्लवित रैना
    इंद्रधनु के रंग उतरे ‘महक’ के नैना |
    Apake blog par pahalee bar ayee hoon .lekin savan kee fuharon ne man moh liya.sundar panktiyan.
    Poonam

  31. rahul upadhyay said,

    July 22, 2009 at 3:21 am

    bahut sundar ……likhate rahiye…….

  32. July 22, 2009 at 1:00 pm

    महक जी,

    बहुत ही खूबसूरत अश’आर है :-

    बारिश की लड़ी से नव पल्लवित रैना
    इंद्रधनु के रंग उतरे ‘महक’ के नैना |

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

  33. Sulabh said,

    July 23, 2009 at 1:35 pm

    मौसमी अशआर है. एक खूबसूरत बयार है.

    - सारा जीवन यादों का इंद्रजाल हैं

  34. July 29, 2009 at 12:32 am

    सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
    बूंदो के झुमके पहन भीग रही छत पे

    क्या बात है? कालोनी के बच्चो को मै भी देखता रहता हू भीगते हुए और अपने दिन याद करता हू॥ :)

  35. dr jagmohan Rai said,

    July 29, 2009 at 6:36 pm

    दिल ये कहता है फ़िर इक बार बहक जाएँ हम।

    अब के बारिश में खिलें और महक जाएँ हम।

    dr jagmohan Rai

  36. July 29, 2009 at 6:54 pm

    दिल ये कहता है फ़िर इक बार बहक जाएँ हम।

    अब के बारिश में खिलें और महक जाएँ हम।

    kalaam-e-sajal

  37. Inu Gupta said,

    August 4, 2009 at 5:36 pm

    khubsurat kavita


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