न जाने क्यूँ

imagesकमरे में हल्की सी रौशनी कर दी तुमने… चाहे जो हो मन के आंधियारे ऐसे ही दूर नही होते…जब तुम चाहो आओगे..जब तुम चाहो जाओगे.. ऐसा नही हो सकता….तुम आज़ाद और हम जकड़े इंतज़ार की ज़ंजीरों मे…दिन ब दिन जिनका कसाव मजबूत होता ज़ा रहा है….

पहले यही इंतज़ार,,,,बहुत अच्छा लगता था. ..तेरे साथ के चंद लम्हो के लिये….एक एक कर हज़ारों सितारें लम्हों में गिनना सुहाता था……सिंगार मन लुभाता था…दिल की धड़कनो का रूक कर पूछना…क्या वो आया…बहुत भाता था….चाँद का उल्हाना रास आता था..

हवाओं की शिकयात…पल्को का बोझिल होना….आँखों में आई नींद को रिश्वत देकर दूर भगाना…ख्वाबों पर पानी के छीटे मार के जगाए रखना…तुम जल्दी ही आओगे ये एहसासों को जताए रखना…दिल की आस को जलाए रखना…ना उमीदी को दबाए रखना…
सब कुछ किया….सहा

आज कल इंतज़ार भी थक जाता है तेरी राह तकते…..साथ छोड़ चला जाता है….शमा मोम बन पिघल जाती है… नीर की नदियाँ रुख मोड़ लेती है…आँखें बंद हो जाती है…तेरे आने की आहट पर फिर भी जाने क्यूँ… दिल की एक धड़कन तेज चलती है…….जज़्बातों की आतिशबाज़ियाँ होती हैखिड़की पे चाँदनी खिलखिलाती है……रातराणी के फुंलों सी महक खिलती ही जाती है….. जाने क्यूँ…?

13 Comments

  1. kshama said,

    October 7, 2009 at 5:42 am

    Aapkee gadya rachna bhee kitnee padymay hotee hai! ” Khidkee pe chhandanee khilkhilatee hai…”! Wah ! Apnee thodee-see khushbu ‘ Bikhare sitare’pe de den…wo bhee mehek uthega!
    Ek snehil nimantran bhar hai…anytha na len!

  2. M Verma said,

    October 7, 2009 at 6:18 am

    “….आँखों में आई नींद को रिश्वत देकर दूर भगाना.”
    क्या खूब एहसास है. नज़्म सी यह रचना अंतर्मन को छू जाती है.

  3. October 7, 2009 at 6:45 am

    बहुत सुंदर विचार हैं।
    करवाचौथ और दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।
    ———-
    बोटी-बोटी जिस्म नुचवाना कैसा लगता होगा?

  4. rashmi prabha said,

    October 7, 2009 at 8:07 am

    khoobsurat ehsaason se purn…….diye ki lau jagmaga uthi

  5. om arya said,

    October 7, 2009 at 10:43 am

    behad sundar ……………………..

  6. Mahfooz said,

    October 7, 2009 at 10:58 am

    आज कल इंतज़ार भी थक जाता है तेरी राह तकते…..साथ छोड़ चला जाता है….शमा मोम बन पिघल जाती है… नीर की नदियाँ रुख मोड़ लेती है…आँखें बंद हो जाती है…तेरे आने की आहट पर फिर भी जाने क्यूँ… दिल की एक धड़कन तेज चलती है…….जज़्बातों की आतिशबाज़ियाँ होती है…खिड़की पे चाँदनी खिलखिलाती है……रातराणी के फुंलों सी महक खिलती ही जाती है…..न जाने क्यूँ…?

    hmmmmm. bahut khoob………… very nice description……..

    ख्वाबों पर पानी के छीटे मार के जगाए रखना…तुम जल्दी ही आओगे ये एहसासों को जताए रखना…दिल की आस को जलाए रखना…ना उमीदी को दबाए रखना…

    yeh panktiyan bahut achchi lagin……. ummeedon se bhari……………

    gr8888888

  7. October 7, 2009 at 1:34 pm

    प्रेम में प्रतीक्षा न हो तो वह प्रेम कैसा…

    रूमानी बातें बड़े ही रूमानियत से लिखा है आपने…

  8. digamber said,

    October 7, 2009 at 7:00 pm

    तेरे आने की आहट पर फिर भी जाने क्यूँ… दिल की एक धड़कन तेज चलती है…….जज़्बातों की आतिशबाज़ियाँ होती है…

    शायद इसी को तो प्यार कहते हैं ………. हर सू तू ही तू नज़र आती है ……… न जाने क्यों …… लाजवाब लिखा है ……

  9. vijay kumar said,

    October 8, 2009 at 8:17 am

    mehak ,

    how do you write such touchy touchy words.. majha dolyache kone nam jhale aahe .. me kaay bolu.. this is amazing work boss. jjust aapki lekhni ko salaam..

    mehak , maazi poetry chi marathi translation karu saktye ka tumhi .. mala saangna..

    is post ke liye meri badhai sweekar karen..

    regards

    vijay

  10. October 8, 2009 at 1:26 pm

    Simply Mind Blowing!!!

  11. October 8, 2009 at 1:52 pm

    “चाँद का उल्हाना रास आता था..”

    आपके इन ही मिस्‍रों का फैन हूं मैं..

  12. preeti tailor said,

    October 9, 2009 at 9:18 am

    ye lamhe bade hi khubsurat hote hai ….

  13. urmi said,

    October 9, 2009 at 1:31 pm

    वाह बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लिखा है ! पढ़कर बहुत अच्छा लगा!


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