झर झर शाख से झरती हुई पत्तियाँ
हर एक पे तेरा नाम लिखने की कोशिश करती हूँ
और तुम हसकर इसे हमारा बचपना कहते हो…..
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तोड़ी थी अनगिनत पत्तियाँ एक एक कर
उंगलियाँ भी दर्द से करहाती
तेरे प्यार की गहराई को नाप न सके मगर …….
अप्रैल 2, 2011 at 7:53 अपराह्न (त्रिवेणी)
झर झर शाख से झरती हुई पत्तियाँ
हर एक पे तेरा नाम लिखने की कोशिश करती हूँ
और तुम हसकर इसे हमारा बचपना कहते हो…..
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तोड़ी थी अनगिनत पत्तियाँ एक एक कर
उंगलियाँ भी दर्द से करहाती
तेरे प्यार की गहराई को नाप न सके मगर …….
काजल कुमार said,
अप्रैल 3, 2011 at 7:54 पूर्वाह्न
xheavenlyx said,
अप्रैल 3, 2011 at 2:04 अपराह्न
saral man ke sundar bhav …. prem ki gehrayee kahaan koyee naap sakaa hai.
digamber said,
अप्रैल 4, 2011 at 9:50 पूर्वाह्न
झर झर शाख से झरती हुई पत्तियाँ
हर एक पे तेरा नाम लिखने की कोशिश करती हूँ
और तुम हसकर इसे हमारा बचपना कहते हो…..
उफ्फ … कतल लिखा है …
tailor preeti said,
अप्रैल 7, 2011 at 7:07 पूर्वाह्न
khub gahri soch ….
Rewa Smriti said,
अप्रैल 27, 2011 at 1:04 अपराह्न
तेरे प्यार की गहराई को नाप न सके मगर …….
Kash, pyar aur jajbat ki gahrai ko bhi naapne wala koi maschine hua hota…
Asha Joglekar said,
जून 6, 2011 at 11:27 पूर्वाह्न
Mehek khoob sunder likah hai.
her pattipar tumhara nam likhne kee koshish kya bat hai pyar ka khoobsurat ahsas.
vijay said,
अगस्त 18, 2011 at 8:52 पूर्वाह्न
बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आया हूँ . और इस रचना को पढकर मन भावुक हो गया है .. बहुत अच्छे शब्द .. बहुत अच्छे भाव.. यादो को हवा देते हुए.. बधाई हो ..
आभार
विजय
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कृपया मेरी नयी कविता ” फूल, चाय और बारिश ” को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html