कितने याद आते हो कभी

कितने याद आते हो कभी
और लगते हो बहोत अपने से
कुछ बारिश में भीगे वो लम्हे
जब बरसते है मन के आंगन पर,
चलती हूँ मैं भी
खुली हरियाली पर दामन में
यादों को समेट कर
महसूस कर लेती हूँ उन्हे कुछ पल
निगाहों से निहार कर
उछाल देती हूँ,दव की बूंदों संग
मिल जाने के लिए
आज में वापास आने के लिए,
जानती जो हूँ तुम बहुत दूर हो अब कही………..

7s टिप्पणियाँ

  1. सितम्बर 30, 2011 at 2:13 अपराह्न

    बहुत ही गहन भाव, शुभकामनाएं.

    रामराम

  2. Ranju Gupta said,

    अक्टूबर 1, 2011 at 4:50 पूर्वाह्न

    love you su

  3. Ranju Gupta said,

    अक्टूबर 1, 2011 at 4:51 पूर्वाह्न

    aaj ke is dau me ek achchha insan mil pana bahut hi mushkil hai.

  4. Rewa Smriti said,

    अक्टूबर 2, 2011 at 2:17 अपराह्न

    Bahut sunder Mehek…after a gap I read your poem today.

  5. अक्टूबर 3, 2011 at 6:17 पूर्वाह्न

    अच्‍छे भाव हैं। शुभकामनाएं

  6. अक्टूबर 19, 2011 at 3:48 अपराह्न

    मेहेक बहुत सुंदर कविता है प्रेम भी संतोष भी । कैसी हो बहुत व्यस्त लग रही हो ।

  7. नवम्बर 26, 2011 at 8:41 पूर्वाह्न

    मेहक, बहुत दिनों बाद इस ब्लॉग पर आना हुआ । और तीन खूबसूरत कविताओं से मुलाकात हुई ।
    याद ऐसी ही चीज है आती है बडी शिद्दत के साथ ।


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