उड़ जा पंछी भोर भई
December 13, 2007 at 3:48 am (उड़ जा पंछी भोर भई)
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अब तक तुम गहरी नींद सोए हुए हो
किन सच्चे झूठे सपनो में खोए हुए हो
वो कौनसी यादे है जो पीछा नही छोड़ती
वो कौनसी राहे है जो आगे नही बढ़ती
उन पुरानी यादों को तुम भुला दो
उन बेमानी बातों को तुम सुला दो
ख्वाबो और हवाओ में नही बनते महल
जिद्द पर तुम उतर आओ अगर
कीचड़ में भी खिल जाते है कवल
बस अपने धेय पर अटल रहना
दृढ़ निश्चय से जीवन लक्ष की और बढ़ना
जगाओ मन में आज,एक और नयी आशा
चूनलो अपने लिए,एक और नयी दिशा
कल की निशा के साथ,बीती बात गयी
उड़ जा रे पंछी , एक नयी भोर भई.



