कठपुतली का खेल
March 6, 2008 at 6:54 pm (कठपुतली का खेल.)
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जनमानस सब जिंदा तो है
पर मन की भावनाए मरी हुई
बाहरी काया ही आकर्षित करती
आत्मा दबी,जैसे कठपुतली सजी हुई
किसिका किसीसे ना कोई लेना देना
बस अपनी ताल में नाच नाचना
खुद के लिए ही भला सोचना
स्वार्थ के लिए दूसरे को बेचना
कोई मुसीबत में है तो क्या ?
राम जाने,उसका क्या हो,खुद बचना
जो है आज की दौलत का कुबेर धनी
उसके साथ ही दोस्ताना बनता अपना
जाने किस दिन वो सूरज निकलेगा
होगा इंसान से इंसान का सच्चा मेल
वरना तो धागो से बंधे नाच रहे
जीवन का ये कठपुतली का खेल.



