ग़ज़लो की दीवानी
January 9, 2008 at 3:47 am (ग़ज़लो की दीवानी)
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ग़ज़लो की दीवानी
आज कल पग पग निशानी
मैं बस ग़ज़ल सोचती जाउ
किसी पल तुम देखो मुझको
मैं बस ग़ज़ल तलाशती पाउ |
ना जाने ये कैसा खुमार है
मुझे इससे कब इनकार है
ग़ज़ल बन रहा मेरा जीवन
मुझे इससे अब इकरार है |
जिस गली भी लगा शामियाना
तखलूस हो रही ग़ज़ल जहा पर
कही और ढूँढने की नही ज़रूरत
मुझे भी तुम पाओगे वहा पर |
दिल से सुनती हूँ ग़ज़ल को
दिल से अपनाती हर लफ्ज़ को
भारी उर्दू अल्फ़ाज़ जो ना समझू
दिल से कोई अर्थ लगाती उनको |
हम तो बस इतना ही जानते
शेर जोड़ कर ग़ज़ल है बुनते
काफिया,बहर,मतला,रदिक
ये सब हम नही समझते |
हम भी ये सब सीखना चाहे
ताकि खालिस ग़ज़ल लिख पाए
हम भी खुदकी महफ़िल सजाए
और ग़ज़लो की दीवानी कहलाए.|
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