दीदार
December 6, 2007 at 2:40 am (दीदार)
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दीदार
खुश है मेरी बन्नो,आज मधुचंद्र की रात
सज सवर कर बैठी है
नही करती किसीसे बात
कुछ भी कहो ,गुलाब सी शरमाए
पलकों को झुकाए,नयनो से मुस्कुराए
शायद मेरी बन्नो,थोड़ी सी इतराए
पवन के छूअन से भी,थोड़ी सी सहराए
मुखमंडल पर उसकी,चँदनी का तेज
रंगबिरंगी फूलों से महेकती उसकी सेज
ओढ़ के घूँघट हया का
अपने साजन का करती इंतज़ार
हम भी अब चले यहा से
के बन्ना आया है करने
दुल्हने चाँद का दीदार.
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