मुक्ति
January 7, 2008 at 3:25 am (मुक्ति)
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मुक्ति
1. भोर की लालिमा
मन में असीम भक्ति
हाथों में पूजा थाल
तुलसी की परिक्रमा
मंत्रो का उच्चारण जाप
शन्खो का नीनाद
भजन स्तुति गाउ
प्रभु में विलीन हो जाउ
मुक्ति चिन्ताओ से |
2. नारी हूँ मैं
देवी का रूप हूँ मैं
जग की जननी हूँ मैं
ममता की मूरत हूँ मैं
समाज से पीड़ित हूँ मैं
पूजते है,जलाते भी है
अपनाते है,छलते भी है
सब की हूँ,मेरा स्वयं
अस्तित्व भूलते है
हा आज चाहती हूँ मैं
मुक्ति दोगले विचारो से |
3. विशाल अंबर
बस यूही निहारूं
मन ही मन में
उसे छूकर आउ
पिंजरे में बंद हूँ
कैसे उड़ जाउ
आवाज़ दब गयी
आस तड़प बन गयी
स्वछन्द उड़ना चाहूं
पंछी की आज़ादी पाउ
मुक्ति क़ैद से |
4. कालचक्र सदैव कार्यरत
ये जीवन पूर्ण ताहा जिया
अंतिम पड़ाव अब आया
अनकहा संदेसा संग लाया
मोह जीने का और बढ़ाया
सच से किसने धोका खाया
आख़िर सबने इसे अपनाया
एक दिन जीवनधारा रूठेगी
सांसो की डोर कभी टूटेगी
सब कुछ खामोश
रह जाएगा सन्नाटा
अभिलाषा मोक्ष प्राप्ति की
मुक्ति जग से |
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