मैं कविता लिखती हूँ
December 27, 2007 at 1:16 pm (मैं कविता लिखती हूँ)
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मैं कविता लिखती हूँ
लोगो ने मुझसे पूछा,तुम ऐसी कैसी हो
बाहर से पिघला मक्खन,अंदर से मोम जैसी हो |
इतनी कोमल भावनाए,तुम कैसे रखती हो
अनजान के दर्द में भी तुम सिसकती हो |
इस नश्तर जहा में,गर कदम तुम्हे रखना है
खुद के पैर जमाने,सशक्त तुम्हे दिखना है |
अभी इसी वक़्त तुम खुदको बदलो आज
नये जमाने में चलन का,हम तुम्हे देते राज़ |
मैं मृदुभाषी ,सबको हसाती रूलाती,कला की दासी
शोहरत का मोह नही,दो मीठे बोल की प्यासी |
जवाब में सबको मैं क्या और कैसे बताउ
कोमल हृदय की स्वामिनी,सबको कैसे समझाउ |
हमेशा मृदु मुलायम रहूंगी,खुदको बदल नही सकती हूँ
एसी इसलिए नज़राउ,क्योंकि मैं कविता लिखती हूँ |
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