खुद कभी पहल किया कीजिए

खुद कभी पहल किया कीजिए एक कदम
राह तो एक ही मंज़िल पर मिलेंगी हमारी
माना के कल ही बात हुई थी जैसे अपनी
ऐसा क्यूँ लगता है मुद्दत हुई तेरी आवाज़ सुने हुए….

ए दिल मेरे कुछ तो बता दे

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ए दिल मेरे कुछ तो बता दे,किस जहाँ में खोया रहता है तू
भावनाओ की नदिया में बिन कश्ती क्यूँ बहता रहता है तू |

जानता है जिद्दी.राह-ए-मोहोब्बत का सफ़र कितना मुश्किल
फिर भी बार बार ठोकर खाकर दर्द-ओ-ज़ख़्म सहेता है तू |

हज़ार मिन्नते करते है,कभी मन की बात भी सुन लिया करो
वो काफ़िर अपने और हम दुश्मन ,नासमझ क्या कहता है तू |

अज़ीज़ संगदिल

अश्कों के समंदर बहाए थे
के वो हमारे दर से खफा निकला
अब खुद पे हसते है जो मालूम हुआ
वो अज़ीज़ संगदिल बेवफा निकला

जो चली इश्क़ की पुरवाई

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जो चली इश्क़ की पुरवाई
सिंदूरी शाम हौले मुस्कुराई

इस अदब से बाहों में कैद किया
खिली रजनीगंधा ,महकी शरमाई

रौशनी से अंबर जगमगा उठा
बड़े शौक से हर चाँदनी झिलमीलाई

मिलन की बेला , दो दिल जुड़े
सारी कायानात में गूंजी शहनाई …

तुम कहती रहो

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तुम कहती रहो , हम निहारते रहे
साथ पल यू ही गुज़ारते रहे

शमा की जरा सी रौशनी में बैठे
घूंघराली लट गालों पे सवारते रहे

बीच में आए कुछ खामोश लम्हात्
निगाहों से जज़्बात दुलारते रहे

कही आहट हुई ,हड़बड़ा के जागे नींद से
तुम ख्वाब से ओझल , हम पुकारते रहे..

राह में यूही मिल गया कोई

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राह में यूही मिल गया कोई
वक़्त में कितना बदल गया कोई

नज़दीक से गुज़रे, पहचान न पाए
अनजान सा करीब से निकल गया कोई

याद ही नही के रूबरू हुए कभी
याद सा दिल में मचल गया कोई

बरसाती ख़याल कुछ यू भी

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मेघा आज फिर टुटके बरसे तुम मीत से
माटी से ‘महक’ ऊठी , इश्क में सराबोर निकली |

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ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली |

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मौसम खुशनुमा , फ़िज़ायें भी ‘महक’ रही
तेरा नाम क्या लिया, फूलों की बरसात हुई |

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सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
बूंदो  के झुमके  पहन भीग रही छत पे |

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बारिश की लड़ी से नव पल्लवित रैना
इंद्रधनु के रंग उतरे ‘महक’  के  नैना |

रेत पर पाओ के कुछ निशान थे

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रेत पर पाओ के कुछ निशान थे
लहरों से मिट जायेंगे अन्जान थे

मुद्दतों बाद गांव की याद आई
बचपन खेले वो कमरे वीरान थे

शहादत पे सियासत हावी हो रही
खोये वो लोग देश की जो शान थे

दूर बैठकर परेशानियाँ हल न होंगी
मुश्किल लगे सवाल बड़े आसान थे

काफिये मिला दो और बनी ग़ज़ल
बहर का ज्ञान नहीं,हम नादान थे

महफिल में बैठी नज़्म सुनाये ‘महक’
दिल में ऐसे ही कुछ अरमान थे

गुजरे लम्हों की याद दिलाई किसने

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गुजरे लम्हों की याद दिलाई किसने

बुझी  शमा दोबारा सुलगाई किसने

 

चिंगारी से भड़केंगे शोले हजारों देखना

विद्रोह की आग दिल में जलाई किसने

 

अमन- सफरनामा शुरू हुआ है अभी

हिंसा की मूरत , बिच राह बनाई  किसने

 

बस और नहीं जानमाल पर हमला

खून से सनी काली रत भुलाई किसने

 

वार करके भागने की फितरत कायर

चोटो पर मरहम कभी लगाईं  किसने

 

सुधर जाए इससे पहले के सब ख़त्म हो

के रब पूछे ये स्नेह धारा बनाई  किसने

ये इश्क भी क्या क्या खता करवाता है

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ये इश्क भी क्या क्या खता करवाता है
महबूब -ओ-दिल पे शक की सुइयां दिखाए

माना उनसा इमानदार न कोई कायनात में
वक़्त के साथ चलना उन्हें आता नहीं

मुलाकात की जगह हम मौजूद पहले से
राह चलते लोगों की सवालिया नज़र का क्या जवाब दे

ये कैसा इम्तेहान लेते वो हमारा
पर्चा भी हम दे और जाच भी हम करे

मुस्कुराके आयेंगे जनाब बहानों का गुलदस्ता लिए हुए
ये भी याद नहीं पिछली बार यही बहाना था

वादा-ए-रस्म उन्हें निभाना आएगा भी या नहीं
या हम रूठना और वो मनाना इस खेल के नियम बनेगे

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