खुद कभी पहल किया कीजिए एक कदम
राह तो एक ही मंज़िल पर मिलेंगी हमारी
माना के कल ही बात हुई थी जैसे अपनी
ऐसा क्यूँ लगता है मुद्दत हुई तेरी आवाज़ सुने हुए….
खुद कभी पहल किया कीजिए
अक्टूबर 21, 2011 at 6:19 पूर्वाह्न (shayari, Uncategorized)
ए दिल मेरे कुछ तो बता दे
अक्टूबर 27, 2009 at 2:56 अपराह्न (shayari)

ए दिल मेरे कुछ तो बता दे,किस जहाँ में खोया रहता है तू
भावनाओ की नदिया में बिन कश्ती क्यूँ बहता रहता है तू |
जानता है जिद्दी.राह-ए-मोहोब्बत का सफ़र कितना मुश्किल
फिर भी बार बार ठोकर खाकर दर्द-ओ-ज़ख़्म सहेता है तू |
हज़ार मिन्नते करते है,कभी मन की बात भी सुन लिया करो
वो काफ़िर अपने और हम दुश्मन ,नासमझ क्या कहता है तू |
अज़ीज़ संगदिल
अक्टूबर 4, 2009 at 3:49 पूर्वाह्न (shayari)
अश्कों के समंदर बहाए थे
के वो हमारे दर से खफा निकला
अब खुद पे हसते है जो मालूम हुआ
वो अज़ीज़ संगदिल बेवफा निकला
जो चली इश्क़ की पुरवाई
सितम्बर 17, 2009 at 7:11 पूर्वाह्न (shayari)
Tags: shayari

जो चली इश्क़ की पुरवाई
सिंदूरी शाम हौले मुस्कुराई
इस अदब से बाहों में कैद किया
खिली रजनीगंधा ,महकी शरमाई
रौशनी से अंबर जगमगा उठा
बड़े शौक से हर चाँदनी झिलमीलाई
मिलन की बेला , दो दिल जुड़े
सारी कायानात में गूंजी शहनाई …
तुम कहती रहो
अगस्त 30, 2009 at 3:03 अपराह्न (shayari)
Tags: shayari, sher

तुम कहती रहो , हम निहारते रहे
साथ पल यू ही गुज़ारते रहे
शमा की जरा सी रौशनी में बैठे
घूंघराली लट गालों पे सवारते रहे
बीच में आए कुछ खामोश लम्हात्
निगाहों से जज़्बात दुलारते रहे
कही आहट हुई ,हड़बड़ा के जागे नींद से
तुम ख्वाब से ओझल , हम पुकारते रहे..
राह में यूही मिल गया कोई
जुलाई 30, 2009 at 1:08 अपराह्न (shayari)
Tags: shayari, yaad

राह में यूही मिल गया कोई
वक़्त में कितना बदल गया कोई
नज़दीक से गुज़रे, पहचान न पाए
अनजान सा करीब से निकल गया कोई
याद ही नही के रूबरू हुए कभी
याद सा दिल में मचल गया कोई
बरसाती ख़याल कुछ यू भी
जुलाई 17, 2009 at 5:40 अपराह्न (shayari)
Tags: baarish, indradhanu, ishq, meet, mehek, sawaan

मेघा आज फिर टुटके बरसे तुम मीत से
माटी से ‘महक’ ऊठी , इश्क में सराबोर निकली |
================================
ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली |
=================================
मौसम खुशनुमा , फ़िज़ायें भी ‘महक’ रही
तेरा नाम क्या लिया, फूलों की बरसात हुई |
=================================
सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
बूंदो के झुमके पहन भीग रही छत पे |
==================================
बारिश की लड़ी से नव पल्लवित रैना
इंद्रधनु के रंग उतरे ‘महक’ के नैना |
रेत पर पाओ के कुछ निशान थे
अप्रैल 25, 2009 at 5:37 पूर्वाह्न (shayari)
रेत पर पाओ के कुछ निशान थे
लहरों से मिट जायेंगे अन्जान थे
मुद्दतों बाद गांव की याद आई
बचपन खेले वो कमरे वीरान थे
शहादत पे सियासत हावी हो रही
खोये वो लोग देश की जो शान थे
दूर बैठकर परेशानियाँ हल न होंगी
मुश्किल लगे सवाल बड़े आसान थे
काफिये मिला दो और बनी ग़ज़ल
बहर का ज्ञान नहीं,हम नादान थे
महफिल में बैठी नज़्म सुनाये ‘महक’
दिल में ऐसे ही कुछ अरमान थे
गुजरे लम्हों की याद दिलाई किसने
मार्च 17, 2009 at 5:35 पूर्वाह्न (shayari)
गुजरे लम्हों की याद दिलाई किसने
बुझी शमा दोबारा सुलगाई किसने
चिंगारी से भड़केंगे शोले हजारों देखना
विद्रोह की आग दिल में जलाई किसने
अमन- ओ – सफरनामा शुरू हुआ है अभी
हिंसा की मूरत , बिच राह बनाई किसने
बस और नहीं जानमाल पर हमला
खून से सनी काली रत भुलाई किसने
वार करके भागने की फितरत कायर
चोटो पर मरहम कभी लगाईं किसने
सुधर जाए इससे पहले के सब ख़त्म हो
के रब पूछे ये स्नेह धारा बनाई किसने
ये इश्क भी क्या क्या खता करवाता है
मार्च 8, 2009 at 6:24 पूर्वाह्न (shayari, Uncategorized)
Tags: ishq, kavita, mehboob, poem, pyar
ये इश्क भी क्या क्या खता करवाता है
महबूब -ओ-दिल पे शक की सुइयां दिखाए
माना उनसा इमानदार न कोई कायनात में
वक़्त के साथ चलना उन्हें आता नहीं
मुलाकात की जगह हम मौजूद पहले से
राह चलते लोगों की सवालिया नज़र का क्या जवाब दे
ये कैसा इम्तेहान लेते वो हमारा
पर्चा भी हम दे और जाच भी हम करे
मुस्कुराके आयेंगे जनाब बहानों का गुलदस्ता लिए हुए
ये भी याद नहीं पिछली बार यही बहाना था
वादा-ए-रस्म उन्हें निभाना आएगा भी या नहीं
या हम रूठना और वो मनाना इस खेल के नियम बनेगे






