satya

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निकली हूँ आज,खोजने कुछ जवाब
सुलझानी है कुछ उलझाने
क्या बदली जा सकती है हाथों की लकीरें
या वही होता है जो लिखा हो तकदीर में
क्या मोड़ सकते है हम ज़िंदगी की राहे
शायद हा,कभी कभी,अगर है उम्मीद
नाकामयाबी के बाद ही,तो आती है जीत
कहना कितना आसान,मुश्किल जाना उस पार
पर सुना है कोशिश करनेवालों की नही होती हार
थक जाती हूँ मैं भी कभी,तब लगता सब है असत्य
जीवन मृत्यु का ये चक्र ही,अपना है अंतिम सत्य

3 टिप्पणियाँ

  1. Rewa said,

    जनवरी 25, 2008 at 5:25 अपराह्न

    थक जाती हूँ मैं भी कभी,तब लगता सब है असत्य…
    Na kabhi nahi thakna hai……na hi kabhi haar manna hai….jeeven ek baar mila hai bus has kar her din ek naye josh ke sath jeena hai…..kyunki zindagi isi ka naam hai!

    Satya ham nahi,
    satya tum nahi,
    Satya hai mahaj sangharsh!

  2. siddharth said,

    मई 7, 2008 at 7:53 पूर्वाह्न

    जीवन मृत्यु का ये चक्र ही,अपना है अंतिम सत्य
    पर मृत्यु से पहले हमें जीना है एक ऐसा जीवन
    जो हजार मृत्यु के बाद भी दुनिया याद करे
    जीवन का हर क्षण अपनी पूर्णता प्राप्त करे

    ‘कामयाबी’ ही पैमाना नहीं जिन्दगी के मूल्यांकन का
    ईमानदार कोशिश ज्यादा अहम्‌ है

    बिस्मिल, आजाद व भगत सिंह आजादी से पहले मर गये
    ईसा भी शूली पर लटकाये गये
    सुकरात को जहर पीना पड़ा
    गांधी भी मारे गये
    लेकिन दुनिया इनकी मृत्यु को नहीं
    इनके जीवन को याद रखती है

    विचार मरता नहीं
    ऊर्जा मिटती नहीं
    प्रतिभा छिपती नहीं
    अलग-अलग रूप ये सदैव जिन्दा हैं

    आइये, मृत्यु का शोक नहीं
    जीवन का उत्सव मनायें
    -सिद्धार्थ

  3. siddharth said,

    मई 7, 2008 at 7:58 पूर्वाह्न

    जीवन मृत्यु का ये चक्र ही,अपना है अंतिम सत्य
    पर मृत्यु से पहले हमें जीना है एक ऐसा जीवन
    जो हजार मृत्यु के बाद भी दुनिया याद करे
    जीवन का हर क्षण अपनी पूर्णता प्राप्त करे
    कामयाबी ही पैमाना नहीं जिन्दगी के मूल्यांकन का
    ईमानदार कोशिश ज्यादा अहम्‌ है
    बिस्मिल, आजाद व भगत सिंह आजादी से पहले मर गये
    ईसा भी शूली पर लटकाये गये
    सुकरात को जहर पीना पड़ा
    गांधी भी मारे गये
    लेकिन दुनिया इनकी मृत्यु को नहीं
    इनके जीवन को याद रखती है
    विचार मरता नहीं
    ऊर्जा मिटती नहीं
    प्रतिभा छिपती नहीं
    अलग-अलग रूप में ये सदैव जिन्दा हैं
    आइये, मृत्यु का शोक नहीं
    जीवन का उत्सव मनायें
    – सिद्धार्थ


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