nakhra

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तू अलबेली , नई नवेली
तू रुपसी, छेल छबली
चलती हे जब तू ईतरा के
चँदनी सी हँसी बिखराए
तेरी सादगी और मोहिनी
मेरे मन को भी लुभाए
तेरी मोर मयूर सी नीगाहे
लगता हे कुछ केहना चाहे
ना जान कर भी जानती हूँ
लगने लगी हे तू सहेली
नज़दीक आओं जितना तेरे
तू बन जाती एक पहेली
सब कुछ कितना अच्छा तुझ में
पर तेरा घमंड मुझे हे अख़रा
में चली दूजी गली
गोरी कौन सहे तेरा नखरा.

4 टिप्पणियाँ

  1. दिसम्बर 2, 2007 at 10:22 पूर्वाह्न

    बहुत बढिया पंक्तियाँ
    दीपक भारतदीप

  2. mehhekk said,

    दिसम्बर 2, 2007 at 10:51 पूर्वाह्न

    shukriya

  3. Rewa said,

    फ़रवरी 21, 2008 at 7:10 पूर्वाह्न

    nice poem!

    hehehe…I too love to do nakhra…. aur mere kuchh frends mujhe kahte hen nakhrewali😉

  4. mehhekk said,

    फ़रवरी 21, 2008 at 12:17 अपराह्न

    shukran rews,nakhrewali sweet girl


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