एक नगमा

सुनती आई हूँ आप सब के गीत मैं आज तक

सन्जो के रखा है मैने हर एक शब्द

आप सब के गीतो की मिठास

घुली हुई है मेरे जीवन में चीनी सी

जिसकी मधुरता है मुझ में आज तक

सारे आपके गीत है नितांत सुंदर

जो करते आए है मुझे मोहित

ख्वाब सा एक बूत बन गयी हूँ मै

जैसे कोई चीज़ हूँ सुशोभित

पर आज मुझमे भी जीवन है जागा

मै भी कुछ कहना चाहूं

लेकर हाथों में मंन की वीना

मैं भी एक सुर सज़ाउ, मैं भी एक नगमा सुनाउ….

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3 टिप्पणियाँ

  1. Rewa said,

    मार्च 19, 2008 at 7:42 पूर्वाह्न

    मैं भी एक सुर सज़ाउ, मैं भी एक नगमा सुनाउ….

    Hmm sunaiye….humsab sunne ke liye or padhne ke liye taiyar baithe hein!🙂

  2. mehhekk said,

    मार्च 19, 2008 at 5:34 अपराह्न

    rews thank u,sunne aur padhne ke liye bhi,hum bhi hai aapke nagme sunne ko taiyyar:)

  3. ashutosh said,

    जून 19, 2008 at 12:59 पूर्वाह्न

    your poem is good but stanza and sonnet are not clear.pls try to make it more good.otherwise everything is ok.


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