फ़िज़ा

फ़िज़ा

यूँ ही आज ख़याल आया , देखु रूप पलटकर
कुछ पल महसूस करू , फ़िज़ा में बदलकर |

फ़िज़ा बनकर मैं , आज़ाद हो चुकी थी
इस ज़मीन से अपना रिश्ता खो चुकी थी |

हवाओं संग कही भी झूमती जा रही थी
पीछे पीछे मेरे , महकती ताज़गी आ रही थी |

घटाओं संग आसमान की सैर करने निकलती
कभी पंछी सी उड़कर , किलबिल करती चहेकती \

शाम को थक कर , जब ढूँढा अपना तिकाना
कही भी नज़र ना आया मेरा आशियाना |

जैसी थी वैसी अच्छी , फ़िज़ा बन भटकना दर बदर है
समझ गयी मैं, आसमान नही , ये ज़मी मेरा घर है |

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1 टिप्पणी

  1. Rewa Smriti said,

    फ़रवरी 24, 2008 at 1:39 अपराह्न

    जैसी थी वैसी अच्छी , फ़िज़ा बन भटकना दर बदर है
    समझ गयी मैं, आसमान नही , ये ज़मी मेरा घर है |

    बहुत ख़ूब! Apni zameen se door hone ka gam mujhe pata hai…..I was missing India so much when I was out of India!


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