आम की बगिया

आम की बगिया

लहराते हरेभरे खेत में
बहती बलखाती नदिया
उसके नज़दीक सजी है
हमारी आम की बगिया

घने घने वृक्षो की काया
शीतल ठंडी उनकी छाया
ग्रीष्म में जब धूप खिले
मीठि बानी कोयल बोले
कच्चे पक्के फिर आम मिले

चढ़ सके वो वृक्ष चढ़ जाए
ना चढ़े वो कंकर से गिराए
रसीले आम सबको ललचाए
ठंडी छाव में सब बैठकर
आमो का आस्वाद उठाए

कही से मुआ माली आता
आम चुराए,शोर मचाता
किसिको वो पकड़ ना पाता
आम लेकर हम भाग जाते

है तो ये बड़ी बात पुरानी
बचपन की एक याद सुहानी
आज भी हर आम को समझू
आम की बगिया की निशानी.

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3 टिप्पणियाँ

  1. विनय प्रजापति said,

    जनवरी 22, 2008 at 5:54 पूर्वाह्न

    आपने मुझे मेरा आम का बाग़ याद दिला दिया!

  2. Rewa said,

    फ़रवरी 15, 2008 at 2:10 पूर्वाह्न

    Hmm…is poem ko padh mujhe ek bhojpuri song yaad aa rahi hai….
    Amuwa mahuwa se jhare dariya…tani tak na balamwa hamar ghoriya… its a bhojpuri song and sang by Shradha sinha🙂

  3. कुश said,

    अप्रैल 13, 2008 at 4:41 पूर्वाह्न

    बचपन की याद आ गयी.. बहुत आम खाया करते थे तब.. बहुत अच्छे


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