माटी का घड़ा

माटी का घड़ा

मैं तो अब तलक़ सुखी सी माटी थी
मैं धूल सी उड़कर आती जाती थी |

मैं जिसके भी अंग लग जाती थी
मैं तुरंत खुद को जमीपर पाति थी |

कुम्हार बस तूही दयालु इंसान आया
जिसने मुझे उठाया,भिगोया,अपनाया |

तूने ही मुझे जीवन चक्रपर चलाया
सुखी माटी से मजबूत घड़ा बनाया |

फिर आग की तपती लौ में जलाया
कच्चे घड़े को अंदर से पक्का कराया |

आज खुदपे नाज़ है,सब के काम आउ
कितने ही प्यासो को मैं पानी पीलाउ |

1 टिप्पणी

  1. arpita said,

    मई 16, 2010 at 5:49 पूर्वाह्न

    very beautiful


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