sone ka pinjar

सारे ऐहीक सुख है उसके पास
किसी चीज़ की नही है कमी
सोचती क्या किस्मत उसने पाई
सोने की दुनिया,उसके हिस्से आई
बास कुछ केहने की देर
सब तुरंत मिल जाता
फिर उसके चेहरे पर
वो नूर क्यों नही आता ?
जिस नसीब पर उसे था नाज़
उस पर ही रोना आता क्यों आज
वो एक आज़ाद पंछी है,रहती वो आसमान पर
ये सोने का पिंजर ,कैसे हो गया उसका घर?
खोल दो ये क़ैद का बंधन
कर दो उसे आज़ाद
फैलाने दो उसे वो पंख
हवा को चिरती उसकी उमंगे
उड़ने दो उसे भी उनके संग
देखने दो उसे,उँचाई से ये मंज़र
उपर किरनो की बाहे,नीचे गहरा समंदर
खोजना है उसे,एक नया आकाश
तलाश करना है अपना अस्तित्व
बनाना है ख़ुद का .व्यक्तित्व

1 टिप्पणी

  1. Rewa said,

    फ़रवरी 18, 2008 at 2:49 पूर्वाह्न

    खोजना है उसे,एक नया आकाश
    तलाश करना है अपना अस्तित्व
    बनाना है ख़ुद का .व्यक्तित्व

    Ati sunder. Mehek, plz Recent comments wala option dalo apne blog mein! Jo bhi comment karenge unka name wahan pata chalega…aise pata hi nahi chal raha hai! kabhi-2 comments padhne mein kafi masti aati hai🙂


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