शमा जलाकर हम बैठे है

हम सदा ही मुस्कुरा जाते है
आपके हर एक दीदार में |

मोहोब्बत के मोती पिरोए है
आपके हर लफ़्ज-ए- इज़हार में |

इश्क़   के   जाम  छलकते है
आपकी हर मीठि तकरार में |

सहर हमे तन्हा कर गयी है
आपके मिलन की खुमार में |

शमा जलाकर हम बैठे अब है
नयी शाम आने के इंतज़ार में |

2 टिप्पणियाँ

  1. paramjitbali said,

    दिसम्बर 27, 2007 at 4:24 अपराह्न

    बढिया रचना है।बधाई।

  2. Rewa said,

    फ़रवरी 4, 2008 at 6:15 अपराह्न

    Hmmm…ati sunder.
    shama jalkar
    bujh na jaye
    kisi ke intzar mein…..
    bus is baat se ham darte hen
    tere pyar mein…..🙂


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