मैं कविता लिखती हूँ

ist2_2622741_feather_of_peacock_on_old_book.jpg 

  मैं कविता लिखती हूँ

लोगो ने मुझसे पूछा,तुम ऐसी कैसी हो
बाहर से पिघला मक्ख,अंदर से मो जैसी हो |

इतनी कोमल भावना,तुम कैसे रखती हो
अनजान के दर्द में भी तुम सिसकती हो |

इस नश्तर जहा में,गर कदम तुम्हे रखना है
खुद के पैर जमाने,सशक्त तुम्हे दिखना है |

अभी इसी वक़्त तुम खुदको बदलो आज
नये जमाने में चलन का,हम तुम्हे देते राज़ |

मैं मृदुभाषी ,सबको हसाती रूलाती,कला की दासी
शोहरत का मोह नही,दो मीठे बोल की प्यासी |

जवाब में सबको मैं क्या और कैसे बता
कोमल हृदय की स्वामिनी,सबको कैसे समझा |

हमेशा मृदु मुलायम रहूंगी,खुदको बदल नही सकती हूँ
एसी इसलिए नज़रा,क्योंकि मैं कविता लिखती हूँ |

top post

6 टिप्पणियाँ

  1. दिसम्बर 28, 2007 at 12:25 अपराह्न

    आप के उदगार अच्छे हैं। कविता अच्छा अभ्यास भी चाहती है। आप को श्रेष्ठ कवियों की कविताएं खूब पढ़ना चाहिए, और अपने लिखे में से खारिज करना भी सीखें. आप में एक अच्छा कवि होने के गुण हैं।

  2. दिसम्बर 28, 2007 at 12:30 अपराह्न

    मेरा मेल पता सुधार लें।

  3. दिसम्बर 28, 2007 at 9:54 अपराह्न

    Achi kavita likhi🙂

  4. Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष said,

    दिसम्बर 29, 2007 at 6:23 अपराह्न

    सोच अच्छी है ।

  5. Alok Pandey said,

    सितम्बर 17, 2008 at 10:34 पूर्वाह्न

    ye tune kya kahi
    jo kal tak thi ankahi.
    ——www.pandeyalok.wordpress.com—–


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: