उन ओस की बूँदो का आना

उन ओस की बूँदो का आना

लालिमा की चुनर पूरब पर लहराए
मंद मंद बहती ये शीतल हवाए
खिली कुसुमीता मध्यम मुस्कुराए
फ़िज़ाए जब उसे छूकर गुजरती
अपनी महक हर दिशा में बिखराए
छम छम करती किरनो की पायल
रौशन करती जीवन का हर पल
कही दूर से आए बासूरी की गूंजन
उल्हासित,प्रफूल्लित होता ये मन
कही पंछीयो का किलबिल चहकना
पन्नो का सरस्वति के राग छेड़ना
नाज़ुक , तरल , हसती , दर्पणसी
उन ओस की बूँदो का आना
अपना प्यार पंखुड़ियो पर जताना
ओस की दर्पण में तुम नज़र आते हो
हर बूँद के साथ अपना प्यार दे जाते हो
तुम्ही हो मेरे इस जीवन की आकांक्षा
इसलिए हर सुबह सिर्फ़ तुम्हे देखने
करती हूँ ओस की बूँदो की प्रतीक्षा.

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4 टिप्पणियाँ

  1. RISHABH said,

    दिसम्बर 29, 2007 at 12:42 अपराह्न

    bhai bahut accha likha hai par agli bar aisa likhna ki samaz mai aae

  2. दिसम्बर 30, 2007 at 12:06 अपराह्न

    ओस की दर्पण में तुम नज़र आते हो
    हर बूँद के साथ अपना प्यार दे जाते हो
    ———————————–

    बहुत बढिया
    दीपक भारतदीप

  3. Rewa said,

    फ़रवरी 11, 2008 at 4:31 पूर्वाह्न

    ओस की दर्पण में तुम नज़र आते हो
    हर बूँद के साथ अपना प्यार दे जाते हो

    Bahut sunder….

  4. ami said,

    फ़रवरी 19, 2008 at 12:03 अपराह्न

    In single word—Maasallah


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