ख़ता क्या हुई हमसे

ख़ता क्या हुई हमसे

चाहत  से  बढ़कर  चाहा  है  तुमको
जान से बढ़कर अपनाया है तुमको |

अपनी हसी में,अश्क में बसाया है तुमको
अपने   नसीब   का चाँद   बनाया है   तुमको |

अपने इश्क़ के जाम , खुले-ए-आम पिए है
खफा क्यूँ हो तुम,जो इतने इल्ज़ाम दिए है |

ख़ता  क्या हुई हमसे ,  ये बता दिया होता
तुमने जो रुसवा हमे,सर-ए-आम किया है |

Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा

1 टिप्पणी

  1. kumar said,

    सितम्बर 29, 2009 at 4:56 अपराह्न

    its very nice sir
    aap hindi ko nayi bulandiyo par lekar jaoge mujhe viswas h


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