त्रिवेणी – अक्सर जाती हूँ मैं उस कुए के पास

त्रिवेणी – अक्सर जाती हूँ मैं उस कुए के पास

1.अक्सर जाती हूँ मैं उस कुए के पास
कंठ गीला करने जब लगती है प्यास |
पर और बढ़ती जाए तुझसे मिलन की आस ||

2.राह में मिल जाओ दौड़ती चली आउंगी
तुम्हारे प्यार की बाहो में सिम्मट जाउंगी |
दुनिया के रिवाज़ो को मैने माना ही कब है ||

3.पेड़ पौधो को बढ़ने दो , बहरने दो
हर फल,फूल, बगिया को खिनने दो |
अवनी को एक बार दुल्हन बनने दो ||

4.मुस्कुरालो अभी के यही वो पल है
केह्दो अभी दिल में कोई खलल है |
कल का भरोसा नही,जीवन क्षण भंगूर है ||

2 टिप्पणियाँ

  1. Rewa Smriti said,

    मार्च 15, 2008 at 8:21 पूर्वाह्न

    1.अक्सर जाती हूँ मैं उस कुए के पास
    कंठ गीला करने जब लगती है प्यास |
    पर और बढ़ती जाए तुझसे मिलन की आस ||

    Bahut sunder…..

  2. कुश said,

    अप्रैल 13, 2008 at 4:34 पूर्वाह्न

    अक्सर जाती हूँ मैं उस कुए के पास
    कंठ गीला करने जब लगती है प्यास |
    पर और बढ़ती जाए तुझसे मिलन की आस ||

    सुंदर त्रिवेणी… बधाई


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