साथ में हम भी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

1.जाम पर जाम छलकते रहे
आँखों में सपने पनपते रहे
मोहोब्बत-ए-महफ़िल सजी
रात भर शमा जलती रही
तेरा आना इंतज़ार बन गया
साथ में जले हम भी |

2.मध्यम सी चाँदनी बिखरी
चाँद आया,ये रात निखरी
आगोश में समा गयी चाँदनी
प्यार के अरमान हुए रौशन
तूने जो छू लिया हमे अब
साथ में बहके हम भी |
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5 टिप्पणियाँ

  1. paramjitbali said,

    जनवरी 5, 2008 at 6:26 अपराह्न

    बढिया प्रयास है।

  2. जनवरी 5, 2008 at 8:53 अपराह्न

    मध्यम सी चाँदनी बिखरी
    चाँद आया,ये रात निखरी… sundar..
    Sadar
    hem

  3. जनवरी 5, 2008 at 9:23 अपराह्न

    बहुत खूबसूरत सपना….. जब आँखों में बसता है तो मन बहक ही जाता है.. आप वर्ड प्रेस में हैं सो आज आपको ढूँढ पाए.

  4. parulk said,

    जनवरी 6, 2008 at 2:57 पूर्वाह्न

    bahut khuub…

  5. mehek said,

    जनवरी 6, 2008 at 3:18 पूर्वाह्न

    pramjitji, jyotsanaji, meenakshiji, parulkji aap sab ka tahe dil se shukran,aap sab ne hamara hausla jo bhadaya hai.


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