मुक्ति

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मुक्ति

1. भोर की लालिमा             
मन में असीम भक्ति
हाथों में पूजा थाल
तुलसी की परिक्रमा
मंत्रो का उच्चारण जाप
शन्खो का नीनाद
भजन स्तुति गा
प्रभु में विलीन हो जा
मुक्ति चिन्ताओ से |

2. नारी हूँ मैं
देवी का रूप हूँ मैं
जग की जननी हूँ मैं
ममता की मूरत हूँ मैं
समाज से पीड़ित हूँ मैं
पूजते है,जलाते भी है
अपनाते है,छलते भी है
सब की हूँ,मेरा स्वयं
अस्तित्व भूलते  है
हा आज चाहती हूँ मैं
मुक्ति दोगले विचारो से |

3. विशाल अंबर
बस यूही निहारूं
मन ही मन में
उसे छूकर 
पिंजरे में बंद हूँ
कैसे उड़ जा
आवाज़ दब गयी
आस तड़प बन गयी
स्वन्द उड़ना चाहूं
पंछी की आज़ादी पा
मुक्ति क़ैद से |

4. कालचक्र सदैव कार्यरत
ये जीवन पूर्ण ताहा जिया
अंतिम पड़ाव अब आया
अनकहा संदेसा संग लाया
मो जीने का और बढ़ाया
सच से किसने धोका खाया
आख़िर सबने इसे अपनाया
एक दिन जीवनधारा रूठेगी
सांसो की डोर कभी टूटेगी
सब कुछ खामोश
रह जाएगा सन्नाटा
अभिलाषा मोक्ष प्राप्ति की
मुक्ति जग से |

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9 टिप्पणियाँ

  1. paramjitbali said,

    जनवरी 7, 2008 at 5:18 पूर्वाह्न

    प्रभू के प्रति समर्पण की भावना व्यक्त करती सुन्दर पंक्तियां हैं-

    भोर की लालिमा
    मन में असीम भक्ति
    हाथों में पूजा थाल
    तुलसी की परिक्रमा
    मंत्रो का उच्चारण जाप
    शन्खो का नीनाद
    भजन स्तुति गाउ
    प्रभु में विलीन हो जाउ
    मुक्ति चिन्ताओ से |

  2. जनवरी 7, 2008 at 6:26 पूर्वाह्न

    बहुत सुन्दर भाव…. सच है…ऐसे ही भाव मन मे रह रह कर उठते है…कभी भक्ति का असीम भाव तो कभी ममता मे डूब कर रहने का भाव…. कभी उसी कैद से मुक्ति का भाव… और कभी सब भावों से मुकित का भाव…. ढेरो शुभकामनाएँ…

  3. mehhekk said,

    जनवरी 7, 2008 at 6:55 पूर्वाह्न

    shukram apke sundar vichar pragat karne ke liye.sneh bana rahe.

  4. जनवरी 7, 2008 at 12:45 अपराह्न

    “हां आज चाहती हूँ मैं…’ सच्चाई व सुन्दर भावो से युक्त रचना, बधाई
    विक्रम

  5. सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said,

    जनवरी 7, 2008 at 12:53 अपराह्न

    बहुत अच्छी कविताएं है। आपने सही लिखा है–पूजते भी हैं और जलाते भी

  6. mehhekk said,

    जनवरी 8, 2008 at 5:32 पूर्वाह्न

    aap sab ki aabhari hun

  7. Rewa said,

    जनवरी 25, 2008 at 11:38 पूर्वाह्न

    भोर की लालिमा
    मन में असीम भक्ति
    हाथों में पूजा थाल
    तुलसी की परिक्रमा
    मंत्रो का उच्चारण जाप
    शन्खो का नीनाद
    भजन स्तुति गाउ
    प्रभु में विलीन हो जाउ
    मुक्ति चिन्ताओ से |

    Beautifully written…..antah mann se likha hai aapne…..keep exploring!

  8. mehhekk said,

    जनवरी 25, 2008 at 2:37 अपराह्न

    thanks a lot rewa.

  9. द्विजेन्द्र द्विज said,

    जनवरी 12, 2009 at 5:29 पूर्वाह्न

    नारी हूँ मैं
    देवी का रूप हूँ मैं
    जग की जननी हूँ मैं
    ममता की मूरत हूँ मैं
    समाज से पीड़ित हूँ मैं
    पूजते है,जलाते भी है
    अपनाते है,छलते भी है
    सब की हूँ,मेरा स्वयं
    अस्तित्व भूलते है
    हा आज चाहती हूँ मैं
    मुक्ति दोगले विचारो से.

    बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति है.

    अन्य कविताएँ भी सुन्दर हैं.


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