आई है बसंत बहार

 

 आई है बसंत बहार

सर्द हवाए सुस्ताने लगी
कोहरा भी धुआँ धुआँ
कनक सी कीरने जाल बुनती
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

हर शाख पत्तियो से सजी
बेल हरियाली लहराने लगी
गुलमोहर का चमन खिला
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

झूलो की लंबी कतार
चहेरे पर हँसी फुहार
सखियो संग नचू मनसे
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

फुलो की महक छाई
समीरा मंद मंद बहे
पिहु की पाती लाए
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

8 टिप्पणियाँ

  1. Annapurna said,

    जनवरी 17, 2008 at 5:41 पूर्वाह्न

    सरसो के खेत का चित्र अच्छा है।

  2. alpana verma said,

    जनवरी 17, 2008 at 5:49 पूर्वाह्न

    achchee kavita hai mahak-

  3. mehek said,

    जनवरी 17, 2008 at 7:19 पूर्वाह्न

    shukran annapurnaji aur alpanaji

  4. devskite said,

    जनवरी 21, 2008 at 4:05 पूर्वाह्न

    awesome thoughts and beautiful words, keep it up, well done!

  5. mehhekk said,

    जनवरी 21, 2008 at 5:58 पूर्वाह्न

    shukran devkiteji

  6. pearl.neel@gmail.com said,

    जनवरी 25, 2008 at 11:17 पूर्वाह्न

    Ur poem reminds me of flowers, spring….which is about to come…

  7. shyam said,

    अप्रैल 18, 2010 at 4:00 अपराह्न

    i have seen worst poem in my life


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