ख्वाहिशो के कारवाँ

1.आए है हम भी इस मोड़ पर  
   अपनी महक कुछ छोड़ जाए  
   इन ख्वाहिशो के कारवाँ में  
   कही हमारा भी नाम आए | 

2.हम अकेले ही चल रहे थे
    ज़िंदगी की राहेगुजर
   कारवाँ कब अपना हुआ, जानू
   और कोई आहट भी ऩही |

3.गुज़रते हुए वक़्त के साथ
   बढ गयी है ख्वाहिशे और भी
   गीत ,नज़्म ,ग़ज़लो का कारवाँ
   ज़िंदगी की राहो पे रुके ना कभी |

4.जुड़े तो है इस कारवाँ से
  ये ख्वाहिश बस पूरी हो जाए
  भीड़ में तन्हा  समझू ना खुदको
  दिल में क्यो ये ख़याल आए |

  

12 टिप्पणियाँ

  1. kakesh said,

    जनवरी 21, 2008 at 4:55 पूर्वाह्न

    वाह जी वाह. क्या सुगंधित गुलदस्ता है पहली बार देखा. अब तो यहाँ हर रोज आना होगा. बांकी गुलों से भी रूबरू होते हैं जी.

  2. mehhekk said,

    जनवरी 21, 2008 at 5:35 पूर्वाह्न

    aap ka swagat hai,shukran

  3. Tarun said,

    जनवरी 21, 2008 at 2:43 अपराह्न

    बहुत सुंदर सुगंधित महक फैला के रखी है यहाँ आपने, बस ऐसे ही महकते रहिये।

  4. जनवरी 21, 2008 at 5:23 अपराह्न

    अपने मन की ख्वाहिशों को
    अपने मन में ही रखो
    ज़माना तो भीड़ है
    उससे कोई उम्मीद मत रखो
    ——————————————-
    आपकी यह प्रस्तुति देखकर यह पंक्तियाँ मेरे मन में आयीं
    दीपक भारतदीप

  5. mehhekk said,

    जनवरी 21, 2008 at 5:43 अपराह्न

    aabhari hun tarunji,jo apko hamari kavita ki mehek pasan aayi,shukran

  6. mehhekk said,

    जनवरी 21, 2008 at 5:45 अपराह्न

    deepakji bahut bahut shukran,shayd aap sahi kehte hai,zamanese se koi umid nahi rakhni chahiye,apne khwahisho ka karvan khud hi chalaye hum to behtar.apni bahut sundar panktiya likhi hai.

  7. vikram said,

    जनवरी 25, 2008 at 4:26 अपराह्न

    गुजरते वक्त के साथ……बहुत खूब
    विक्रम

  8. Rewa said,

    जनवरी 25, 2008 at 5:31 अपराह्न

    आए है हम भी इस मोड़ पर
    अपनी महक कुछ छोड़ जाए
    इन ख्वाहिशो के कारवाँ में
    कही हमारा भी नाम आए |

    मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग साथ आते गए, और कारवाँ बनता गया… Mahak yun hi mahakti rahegi….. yahi meri shubhkamna hai….

  9. mehhekk said,

    जनवरी 26, 2008 at 4:18 पूर्वाह्न

    vikramji,rewaji thanks a lot

  10. rashmi prabha said,

    जनवरी 29, 2008 at 10:43 पूर्वाह्न

    ख्वाहिशों के कारवाँ कभी न रुकें, न ही आपकी लेखनी-
    जितनी भी प्रशंसा करूं,कम है.

  11. mehhekk said,

    जनवरी 29, 2008 at 2:02 अपराह्न

    bahut aabhari hun rashmiji.

  12. Ravi said,

    मार्च 9, 2008 at 3:09 अपराह्न

    ravi shankar (kabir) & Rashmi Prabha (nanki)
    good


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