कठपुतली का खेल

जनमानस सब जिंदा तो है

पर मन की भावनाए मरी हुई

बाहरी काया ही आकर्षित करती

आत्मा दबी,जैसे कठपुतली सजी हुई

किसिका किसीसे ना कोई लेना देना

बस अपनी ताल में नाच नाचना

खुद के लिए ही भला सोचना

स्वार्थ के लिए दूसरे को बेचना

कोई मुसीबत में है तो क्या ?

राम जाने,उसका क्या हो,खुद बचना

जो है आज की दौलत का कुबेर धनी

उसके साथ ही दोस्ताना बनता अपना

जाने किस दिन वो सूरज निकलेगा

होगा इंसान से इंसान का सच्चा मेल

वरना तो धागो से बंधे नाच रहे

जीवन का ये कठपुतली का खेल.

15 टिप्पणियाँ

  1. Rewa said,

    मार्च 7, 2008 at 1:21 पूर्वाह्न

    जनमानस सब जिंदा तो है
    पर मन की भावनाए मरी हुई
    बाहरी काया ही आकर्षित करती
    आत्मा दबी,जैसे कठपुतली सजी हुई

    Bahut sahi likha hai!

  2. मार्च 7, 2008 at 12:42 अपराह्न

    बहुत बढ़िया ।
    घुघूती बासूती

  3. anurag arya said,

    मार्च 7, 2008 at 1:39 अपराह्न

    kuch jyada hiuds hai na. ye rachna …kuch gussa bhi hai …..man me…..

  4. मार्च 7, 2008 at 4:28 अपराह्न

    जाने किस दिन वो सूरज निकलेगा

    होगा इंसान से इंसान का सच्चा मेल

    सुन्दर आशा,अच्छी सोच

  5. mehhekk said,

    मार्च 7, 2008 at 6:09 अपराह्न

    rews,ghughuti ji,anurag ji,vikram ji bahut bahut shukran

  6. paramjitbali said,

    मार्च 7, 2008 at 6:40 अपराह्न

    रचना के भाव बहुत अच्छे हैं।बधाई।

  7. Rewa Smriti said,

    मार्च 8, 2008 at 5:04 पूर्वाह्न

    Happy Woman’s day!🙂

  8. मई 24, 2008 at 10:33 पूर्वाह्न

    आपकी रचना सर्वथा उचित है, आजका मानस, जनमानस उस अंधी दौड़ में शामिल जिसका कोई ओर छोर नहीं है। रचना बहुत ही सराहनीय है, आगे भी इसी तरह की रचनाओं की आशा है।
    आपका रमेश मिश्र वाराणसी

  9. harshil said,

    मई 15, 2009 at 12:19 अपराह्न

    THIS IS A VERY NICE POEM

  10. sunita sharma said,

    जून 21, 2010 at 1:31 अपराह्न

    apki rachna ka bhvarth bahut acha hai. isi trha se apani rachna ko hame bhajte rehe.
    thank u for beutiful think

  11. jash said,

    जुलाई 5, 2011 at 4:54 अपराह्न

    बहूत अच्छी

  12. vaibhav said,

    सितम्बर 23, 2011 at 2:01 अपराह्न

    gud poems….

  13. soham kushe said,

    अगस्त 27, 2012 at 2:48 अपराह्न

    nice poem but kathputli gusse se ubalti hain kyonki unhe swatantrata chahiye.

  14. soham kushe said,

    अगस्त 27, 2012 at 3:22 अपराह्न

    😛

  15. soham kushe said,

    अगस्त 27, 2012 at 3:22 अपराह्न

    :O😛 (y)


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