सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार

नीले नभ की छुपी नीलाई
शामल घटाए उस पर छाई
बदरा उमड़ घूमड़ कर आई
अपनी संगिनी को रहे पुकार
इठलाती,बलखाती थिरकत ताल
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

अपनी आने की आहट बताए
प्रकाश चमकती लकीरे बिखराए
खुश होती वो जब ये देखती
इंसानो में अब भी बसता प्यार
बदरा से करती इश्क़ इज़हार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

कोई सृजन पीड़ित नज़र आए
त्रिनेत्र को गहरी नींद से जगाए
करती उनके संग तांडव नृत्य
जब तक असत्य को ना जलाए
ख़त्म करना चाहे धरासे अत्याचार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

सत्य,अहिंसा विजयी हो जाए
सब के संग तब वो जश्न मनाए
हरित क्रांति का संदेसा पहुँचाती
बदरा से कहती अब बरसाए
शीतल बूँदो की मधुरस फुहार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

चाहे जितना हो उन में अंगार
बिजली नभ का गहना शृंगार
बिजली बिन बदरा लगे अधूरे
मिलकर दोनो करे सपने साकार
जीवन को दिलाए नया आकार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/01/2008_31.html#mahak

5 टिप्पणियाँ

  1. paramjitbali said,

    मार्च 9, 2008 at 6:47 अपराह्न

    बहुत बढिया शब्दचित्र खीचा है।सुन्दर रचना है।

  2. Rewa said,

    मार्च 10, 2008 at 9:31 पूर्वाह्न

    Bahut sunder poem likha hai aapne!

  3. anurag arya said,

    मार्च 10, 2008 at 2:43 अपराह्न

    josh hi josh..

  4. rashmi prabha said,

    मार्च 10, 2008 at 4:14 अपराह्न

    बिजली बिन बदरा लगे अधूरे
    मिलकर दोनो करे सपने साकार………
    इसे कहते हैं कवि की कल्पना,वाह!

  5. ajaykumarjha said,

    मार्च 11, 2008 at 5:25 पूर्वाह्न

    aadarniya mehek jee,
    saadar abhivaadan. sabse pehle to is baat ke liye kshmapraarthi hoon ki shayad us din apnepan ke bhaavaavesh mein main kuchh jyada hee bah gaya . aage se dhyan rakhoonga. halanki padhnaa to aapko jaaree rakhoongaa magar tippnni mein pooree saavdhaanee bartungaa. ek baar fir maafee.


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