ऐसी हर सहर कीजिए

ऐसी हर सहर कीजिए 

नींद खुले देखूं तुम्हे ऐसी हर सहर कीजिए 
दिल में छुपाए कुछ राज़ हमे खबर कीजिए | 

पैगाममोहोब्बत भेजा है खत में नाज़निन
बुल हो  गर तोहफाइश्क़ हमसे नज़र कीजिए | 

खुशियाँ बाटने यहा चले आएँगे अनजान भी
किसी के गम में शरीक अपना भी जिगर कीजिए | 

आसान राहों से जो हासिल वो भी कोई मंज़िल हुई
खुद को बुलंद करने तय  मुश्किल सफ़र कीजिए | 

दुश्मनजहाँ के तोड़ रहे है मंदिर मज़्ज़िद
अपने गुनाहो की माफिएअर्ज़  अब किधर कीजिए | 

लहू के रिश्तों से भी मिले अब फरेब – खंजर
परायों से अपनापन नसीब वही बसर  कीजिए | 

ज़मीन समेट्ले बूँदो से वो बादल है प्यासा
आसमान झुके पाने जिसे  प्यार इस कदर कीजिए | 

गुलाब से सजाए लम्हे भी मुरझाएंगे कभी
यादों में उनकी “महकरहे ऐसा असर कीजिए |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

14 टिप्पणियाँ

  1. Rewa Smriti said,

    अप्रैल 9, 2008 at 6:35 पूर्वाह्न

    आसान राहों से जो हासिल वो भी कोई मंज़िल हुई
    खुद को बुलंद करने तय मुश्किल सफ़र कीजिए |

    Wah! Houshlal buland ho to mushkilen bhi asan per jati hai!

  2. anurag arya said,

    अप्रैल 9, 2008 at 7:21 पूर्वाह्न

    आसान राहों से जो हासिल वो भी कोई मंज़िल हुई
    खुद को बुलंद करने तय मुश्किल सफ़र कीजिए |

    bahut badhiya sher…..

  3. mehek said,

    अप्रैल 9, 2008 at 7:23 पूर्वाह्न

    rews,anurag ji bahut shukrana

  4. MEET said,

    अप्रैल 9, 2008 at 8:04 पूर्वाह्न

    गुलाब से सजाए लम्हे भी मुरझाएंगे कभी
    यादों में उनकी “महक”रहे ऐसा असर कीजिए |
    बहुत अच्छा शेर है.

  5. रचना said,

    अप्रैल 9, 2008 at 9:12 पूर्वाह्न

    keep the good work going , you write very well

  6. mehhekk said,

    अप्रैल 9, 2008 at 11:36 पूर्वाह्न

    meet ji,rachanaji bahut aabhari hun.

  7. parulk said,

    अप्रैल 9, 2008 at 3:53 अपराह्न

    bahut pyaari gazal kahi hai mehek aaj aapney…..

  8. अप्रैल 9, 2008 at 6:55 अपराह्न

    दुश्मन-ओ-जहाँ के तोड़ रहे है मंदिर मज़्ज़िद
    अपने गुनाहो की माफिए-ए-अर्ज़ अब किधर कीजिए |
    कया बात हे बहुत सुन्दर हे आप की यह गजल धन्यवाद

  9. mehhekk said,

    अप्रैल 10, 2008 at 7:10 पूर्वाह्न

    paril ji,raj ji tahe dil se shukran

  10. shubhashishpandey said,

    अप्रैल 10, 2008 at 1:16 अपराह्न

    maine aap ki saari rachnayen to padhi nahin hai lekin jitni bhi padhi hai un me ye sabse umda lagi
    bahut he zabardast

  11. menka said,

    अप्रैल 10, 2008 at 3:41 अपराह्न

    bahut hi sundar rachna hai aapki….

  12. अप्रैल 10, 2008 at 4:48 अपराह्न

    नींद खुले देखूं तुम्हे ऐसी हर सहर कीजिए
    दिल में छुपाए कुछ राज़ हमे खबर कीजिए ||
    ज़मीन समेट्ले बूँदो से वो बादल है प्यासा
    |आसमान झुके पाने जिसे प्यार इस कदर कीजिए
    गुलाब से सजाए लम्हे भी मुरझाएंगे कभी
    यादों में उनकी “महक”रहे ऐसा असर कीजिए
    सुन्दर भावनाओ से युक्त अच्छी रचना

  13. mehhekk said,

    अप्रैल 11, 2008 at 5:37 पूर्वाह्न

    shubhashish ji,menka hi,vikramji aap sabhi ka bahut shukran

  14. ila said,

    अप्रैल 11, 2008 at 7:00 पूर्वाह्न

    दुश्मन-ओ-जहाँ के तोड़ रहे है मंदिर मज़्ज़िद
    अपने गुनाहो की माफिए-ए-अर्ज़ अब किधर कीजिए

    बहुत खूब!


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