मखमली शायरी-जिगर मुरादाबादी

मखमली शायरीजिगर मुरादाबादी

यूही दराज़ खोला एक पुरानी मॅगज़ीन हाथ लग गयी,जिस में 
जिगर मुरादाबादी जी पर मिलन जी का बड़ा ही दिलकश लेख था |

.वह लिखती है के जिगर जी की शायरी जैसे शहद में घुले हुए अल्फ़ाज़ ,
जिस में ओस के बूँदों  की मुलायमता है,अपनी महबूबा से मिलने का वादा,
उनके देखे ख्वाब,आकांक्षा,कल्पना,उनकी प्रतीक्षा,हसीना का शबाब,
उनकी मुस्कुराहट,उनसे वियोग के लम्हे,मिलन की बेला,उनका हुस्न,जवानी,
मदहोशी ,ज़िंदगी ,ये सब कुछ बयान करती मखमली शायरी है |

 
अली सिकंदर “जिगर” मुरादाबादी का जनम 1890 में हुआ था,
जब भी वो किसी मुशायरे में शेर पेश करते,कह देते
जिगर थाम के बैठो,अब मेरी बारी है
और इरशाद इरशाद के गूँज से पूरा माहो झूम उठता |

 उसी लेख से कुछ शेर प्रस्तुत है.
दिल खोल के दाद दीजिएगा,अपने जिगर का मामला है |

 

हमने सिने से लगाया दिल  अपना बन सका
मुस्कुरा कर  तुमने देखा दिल तुम्हारा हो गया |
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अब उनका भरोसा वो आए ना आए
  ग़मेमोहोब्बत तुझ को गले लगाले |
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बनाकर अपने हाथों आशिया बर्बाद करते है
जो तेरा काम था वो भी हम सय्याद करते है |
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मेरी ज़िंदगी तो गुज़री तेरी हिज़ के सहारे
मेरी मौत को भी प्यारे चाहिए कोई बहाना |
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बैचेनियाँ समेट कर सारे जहान की
जब कुछ  बन सका तो मेरा दिल बना दिया |
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यू ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तेरे बगैर
जैसे कोई गुनाह किए जेया रहा हूँ |
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मोहोब्बत में जिगर गुज़रे है
ऐसे भी मकाम अक्सर
की खुद लेना पड़ा है
अपने दिल से इन्तेकाम अकसर |
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ज़िंदगी एक हादसा है कैसा हादसा
मौत से भी ख़तम जिस का सिलसिला होता नही |
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बहुत सही सोहोबत गुलो की मगर
वो ज़िंदगी है जो काटो के दरमिया गुज़रे |
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घड़ी भर में नाआशना (अपरिचित) हो गया
न जाने मेरे दिल को क्या हो गया |
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ये मज़ा था खुल्द (स्वर्ग) में भी न मुझे करार होता
जो वहा आँखें खुलती वही इंतज़ार होता |
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तुम मुझ से छूट कर रहे सब की निगाहों में
में तुमसे छूट कर किसी काबिल न रहा |
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दिल से ख़ता हुई तो अब दिल है और में हूँ
नाज़ुक मामला है,तुम फ़ैसला न करना |
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इश्क़ जब तक न करे रुसवा (बदनाम)
आदमी काम का नही होता |
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हम इश्क़ के मारों का बस इतना ही फसाना है
रोने को नही कोई,हसने को जमाना है |
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ये इश्क़ नही आसान इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है |
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ये कह कह के हम दिल को बहला रहे है
वो अब चल चुके है,वो अब आ रहे है |
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जहनुम हो के जन्नत
जो भी हो गया फ़ैसला होगा
ये क्या कम है
हमारा और उनका सामना होगा |
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जफ़ा (बेवफ़ाई) करनेवाले को क्या हो गया है
वफ़ा करने भी हम शर्मा रहे है |
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आज न जाने राज क्या हो गया है
हिज़ (विगोग) की रात और इतनी रौशनी |
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क्या जानिए ख़याल कहा है नज़र कहा
तेरे खबर के बाद फिर अपनी खबर कहा  |
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एक ऐसा राज भी दिल के तहख़ाने में
लुत्फ जिसका कुछ समझने में ना समझाने में |
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ये कहकर दिया उसने दर्दे-मोहोब्बत
जहाँ हम रहेंगे ये सामान होगा |
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आईना चूम चूम रहे थे वो बार बार
देखा मुझे तो यक-बयक शर्मा के रह गये |
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अब क्या जवाब दू मैं की कोई मुझे बता दे
वो मुझ से कह रहे है,क्यों मेरी आरजू की |
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चमन दूर,आशिया बर्बाद,ये टूटे हुए बाजू (पंख)
मेरा क्या हाल हो,सैय्याद (पारधि) गर मुझे रिहा कर दे 
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4 टिप्पणियाँ

  1. अप्रैल 16, 2008 at 2:14 अपराह्न

    बहुत खूब कलेक्शन लाये हैं जिगर साहब का..आनन्द आ गया. आभार.

  2. Rewa Smriti said,

    अप्रैल 16, 2008 at 3:47 अपराह्न

    Wow….wonderful collection!

    shukriya Mehek.

  3. mehhekk said,

    अप्रैल 16, 2008 at 6:19 अपराह्न

    samirji,rews thanks a lot.

  4. sarmad nishaat said,

    जुलाई 13, 2008 at 7:51 अपराह्न

    Jigar Sahab hamari shayari ke nagine hain.Husn o ishq aur insaaniyat ki baat unke yahan bahut gehri bhi hai aur bakhuda bahut oonchai par bhi hai.Hamari zabaan par aapka bahut bada ehsaan hai. Unke ashaar sada chamakte aur mahakte rahenge.


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