सितारे हज़ारों नक़ाब बदलते है

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तुम्हे देख  हमनशी कदम खुद  खुद चलते है
बड़ी मुश्किल से जज़्बादिल हमसे संभलते है |

मिलने तुझ से सातो समंदर भी पार कर जाएँगे
महफूज़ रखेंगे तेरे साए हमे ये सोच  निकलते है |

अंधेरों का ख़ौफ़ नही रहा जिगरजान को हमारी
मोहोब्बत के गवाहचिराग रौशन होके जलते है |

महबूबआफताबजहन के राज़ –ख़यालात यहाँ
वो भी महजबीदिलकशी से मुलाकात हो मचलते है |

फलकआईने से निगाहे निसार  नही होती गुलशन आरा
आपकी आरज़ू में झिलमिल सितारे हज़ारों नक़ाब बदलते है. |

16 टिप्पणियाँ

  1. anurag arya said,

    मई 20, 2008 at 5:22 पूर्वाह्न

    महबूब-ए-आफताब-ओ-जहन के राज़ –ए-ख़यालात यहाँ
    वो भी महजबी-ओ-दिलकशी से मुलाकात हो मचलते है |

    फलक-ओ-आईने से निगाहे निसार नही होती गुलशन आरा
    आपकी आरज़ू में झिलमिल सितारे हज़ारों नक़ाब बदलते है. |

    ये दोनों शेर बहुत पसंद आए एक बात ओर आपका फोटो चुरा लेने का दिल कर आया ……

  2. Shubhashish Pandey said,

    मई 20, 2008 at 5:48 पूर्वाह्न

    kya baat hai
    zabardast

  3. मई 20, 2008 at 7:48 पूर्वाह्न

    मिलने तुझ से सातो समंदर भी पार कर जाएँगे
    महफूज़ रखेंगे तेरे साए हमे ये सोच निकलते है |

    bahut khoob likha hai mehek j i.

    I wish you good luck.

  4. मई 20, 2008 at 8:40 पूर्वाह्न

    मिलने तुझ से सातो समंदर भी पार कर जाएँगे
    महफूज़ रखेंगे तेरे साए हमे ये सोच निकलते है |

    ——————————–
    समंदर किनारे खड़े होकर
    चंद्रमा को देखते हुए मत बहक जाना
    अपने हृदय का समंदर भी कम गहरा नहीं
    उसमें ही डूब कर आनंद उठाओ
    उसमें से फिर भी निकल सकते हो
    अपनी सोच के दायरे निकलकर
    आगे चलते-चलते कहीं समंदर में डूब न जाना
    अभी कई गीतों और गजलों के फूल
    इस अंतर्जाल पर है तुम्हें महकाना
    ……………………………………….
    आपके द्वारा प्रकाशित फोटो और कविता पर यह पंक्तियां कहने का जी आया। आपकी प्रस्तुति वाकई बहुत अच्छी है और आपकी लिखी पंक्तियां उससे मेल खातीं हंै।
    दीपक भारतदीप

  5. mehhekk said,

    मई 20, 2008 at 10:09 पूर्वाह्न

    anurag ji bahut shukrana,photo chura ligiye:):)

    shubhashish ji bahut shukrana

    p k kush tanha ji bahut shukrana

    deepak ji,bahut shukrana,bahut hi khubsurat panktiyan hai,inke liye bahut hi dhanyawad.

  6. kmuskan said,

    मई 20, 2008 at 11:43 पूर्वाह्न

    मिलने तुझ से सातो समंदर भी पार कर जाएँगे
    महफूज़ रखेंगे तेरे साए हमे ये सोच निकलते है |

    har sher bahut khoobsurat hai

  7. rakhshanda said,

    मई 20, 2008 at 12:45 अपराह्न

    महबूब-ए-आफताब-ओ-जहन के राज़ –ए-ख़यालात यहाँ
    वो भी महजबी-ओ-दिलकशी से मुलाकात हो मचलते है |

    फलक-ओ-आईने से निगाहे निसार नही होती गुलशन आरा
    आपकी आरज़ू में झिलमिल सितारे हज़ारों नक़ाब बदलते है. |

    बहुत खूब महक जी , बहुत प्यारी ग़ज़ल है….thanks

  8. मई 20, 2008 at 1:54 अपराह्न

    बहुत उम्दा. सभी शेर बेहतरीन हैं. बधाई.

  9. Rewa Smriti said,

    मई 20, 2008 at 5:06 अपराह्न

    तुम्हे देख ए हमनशी कदम खुद ब खुद चलते है
    बड़ी मुश्किल से जज़्बा-ओ-दिल हमसे संभलते है!

    Beautiful sher!

  10. rohit said,

    मई 20, 2008 at 6:00 अपराह्न

    mehak
    kia khub likhti ho, bada acha likhti ho……..
    har word ek dusre se joda hua, bahut hi accha, kassie apne ko sawedanhin hone ki baat likhi the…bahut hi sunder or tahe dil se nikle shabd hai….
    rohit

  11. mehek said,

    मई 21, 2008 at 3:32 पूर्वाह्न

    kmuskan ji ,rakshandaji,samir ji,rews, rohitji ap sabhi ka dil se shukrana.

  12. Annapurna said,

    मई 21, 2008 at 5:52 पूर्वाह्न

    बहुत ख़ूब !

  13. Ami Jha said,

    मई 22, 2008 at 6:36 पूर्वाह्न

    Mujhe to bahut hi pasand aaya

    love it.

    Aapka jawab nahi

  14. मई 22, 2008 at 2:57 अपराह्न

    gr8 going for urdu words’ usage…

  15. mehhekk said,

    मई 24, 2008 at 4:38 पूर्वाह्न

    annapurna ji,ami ji,nazar ji bahut shukrana


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