अंधेरे से उजाले तक

है ना बहुत गहरा अंधेरा है,
तेरे आसपास का कुछ भी
दिखाई नही दे रहा
झुंझलाहट,क़ैद का आभास
अंधेरों में गुम होती आवाज़े
कोई रोशनदान भी नही
अगर तुम महसूस करोगे
सब की हालत तेरे जैसी है
कोई मद्दत के लिए नही आएगा
इधर उधर टुकूर -२  क्या देख रहे हो
मैं हूँ,तुम्हारे अंदर का चिराग
थोडिसी हिम्मत कर,जलाओ मुझे
धुआँ उठेगा,साँस चढ जाएगी
पर साथ थोड़ी रौशनी भी आएगी
वही तुम्हे राह दिखाएगी
अंधेरों से उजाले तक का
तुम्हारे अस्तित्व का सफ़र
तय करने के लिए….

 

 

14 टिप्पणियाँ

  1. Annapurna said,

    मई 24, 2008 at 6:02 पूर्वाह्न

    क्या बात है ! उम्दा विचार

  2. मई 24, 2008 at 6:50 पूर्वाह्न

    पर साथ थोड़ी रौशनी भी आएगी
    वही तुम्हे राह दिखाएगी
    अंधेरों से उजाले तक का
    तुम्हारे अस्तित्व का सफ़र
    तय करने के लिए….

    वाह!!

    ***राजीव रंजन प्रसाद

  3. मई 24, 2008 at 8:06 पूर्वाह्न

    बढ़िया !
    घुघूती बासूती

  4. anurag arya said,

    मई 24, 2008 at 2:19 अपराह्न

    आज कुछ उदास लगी……क्यों ?अगली बार कुछ आशावादी ओर प्रसन्न मन से लिखिए…..आपका चाँद हमने अपने लेपटोप पर लगा दिया है……

  5. मई 24, 2008 at 3:58 अपराह्न

    बहुत बढ़िया. लिखते रहें.

  6. मई 24, 2008 at 7:38 अपराह्न

    far better writing now a days… gr8 going… keep it up…

  7. ajaykumarjha said,

    मई 25, 2008 at 3:51 अपराह्न

    mehek jee,
    aap yakeenan mujhe bhula chuki hongee. main yada kada aataa rehtaa hoon aapke blog par. alag shailee mein likhee rachnaa achhee lagee. aaj aapse ek madad chahiye. maine bhee wordpress par ek blog banaayaa hai magar athak koshshion ke baavjood usmein hindi mein nahin likh paa rahaa hoon kya karun , yadi samay mile to sahaayaataa karne kee kripa karein.

  8. alpana said,

    मई 25, 2008 at 4:44 अपराह्न

    bahut badiya likha hai mahak!

  9. Shubhashish Pandey said,

    मई 26, 2008 at 10:56 पूर्वाह्न

    थोडिसी हिम्मत कर,जलाओ मुझे
    धुआँ उठेगा,साँस चढ जाएगी
    पर साथ थोड़ी रौशनी भी आएगी
    वही तुम्हे राह दिखाएगी

    bahut badhiyan

  10. mehhekk said,

    मई 26, 2008 at 2:29 अपराह्न

    aap sabhi ka tahe dil se shukrana

    ajay ji ,hindi cant be writen directly in wordpress,hv to use some other tool and then copypaste the matter in wordpress.atleast thats what i do.

  11. ROHIT said,

    मई 27, 2008 at 5:23 अपराह्न

    ,कोई मद्दत के लिए नही आएगा
    इधर उधर टुकूर -२ क्या देख रहे हो
    मैं हूँ,तुम्हारे अंदर का चिराग
    थोडिसी हिम्मत कर,जलाओ मुझे
    धुआँ उठेगा,साँस चढ जाएगी
    पर साथ थोड़ी रौशनी भी आएगी
    वही तुम्हे राह दिखाएगी
    अंधेरों से उजाले तक का
    तुम्हारे अस्तित्व का सफ़र
    तय करने के लिए….

    Badia mehak …. kia khub likkah hai mubarak ho ..
    puri tahrah se haar maane wali nahi ho, roshni ander hi hoti hai..sahi likha hai
    rohit

  12. Rewa Smriti said,

    मई 29, 2008 at 5:10 अपराह्न

    है ना बहुत गहरा अंधेरा है,
    तेरे आसपास का कुछ भी
    दिखाई नही दे रहा

    Hmmm…hai andheri rat to diwa jalana kab mana hai!!!

  13. Neeraj said,

    सितम्बर 3, 2009 at 7:07 पूर्वाह्न

    this poem is awesome…very impressive…very positive.


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