झुरियाँ

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झुरियाँ

“डाकिया” आवाज़ सुन
दौड़ के जाना चाहती आँगन
थके हुए कदम रुक रुक कर ही चलते
थैले से निकलते काग़ज़ देख चहेरा उत्सुक होता
झुरियों की हर लकीर मुस्कुरा के कहती
‘ ला दे हमारी चिट्ठी,पढ़ के भी सुनाइयो
कैसा है लल्ला,तबीयत ठीक,हालचाल बताईयो ‘
निर्विकार उत्तर ‘मनी ऑर्डर है,चिट्ठी नही ‘
यन्त्रवत उसके हाथ अंगूठा लगाते
हर महीने यही तो होता था
झुरियों पर उदासी के बादल मंडराते
सब देखता डाकिया,मन की नम आँखों से
ज़िंदगी के अनेक सपनो से बनी हर झुरी को
बेबस झुरियों के भाव शांत हो जाते
मगर,नीर रुकते नही,आस थमती नही
व्यस्त होगा लल्ला,शायद अगले माह…..


कुछ शब्द भेज दे……………….
 
 

 

 

11 टिप्पणियाँ

  1. anurag arya said,

    मई 31, 2008 at 6:09 पूर्वाह्न

    अब तो sms ने डाकिये का सुख छीन लिया है …..होली दीवाली पे दिख जाते है…..भाव पूर्ण कविता……

  2. मई 31, 2008 at 6:30 पूर्वाह्न

    सही कहा अब डाकिया बीते युग की बात हो गई है अच्छी रचना

  3. shobha said,

    मई 31, 2008 at 8:26 पूर्वाह्न

    महक जी
    क्या कहूँ। इतने सुन्दर अन्दाज़ में आपने वृद्धावथा की पीड़ा को वाणी दी है कि तारीफ के लिए शब्द कम हैं-
    हर महीने यही तो होता था
    झुरियों पर उदासी के बादल मंडराते
    सब देखता डाकिया,मन की नम आँखों से
    ज़िंदगी के अनेक सपनो से बनी हर झुरी को
    बेबस झुरियों के भाव शांत हो जाते
    मगर,नीर रुकते नही,आस थमती नही
    बहुत सुन्दर। सस्नेह

  4. rachna said,

    मई 31, 2008 at 9:17 पूर्वाह्न

    excellent word and emotion quotient in this poem and why no new poem for naari kavita blog . post one of your master pieces there also

  5. मई 31, 2008 at 12:03 अपराह्न

    कोई लिखकर कहे या
    अपनी जुबां से बोले
    कोई ऐसे शब्द कान में अमृत घोले
    मन में छा जाये प्रसन्नता की सरिता
    इसी चाहत में उम्र गुजार दी

    पर प्यासे रहे हमेशा
    कोई नहीं बोल पाया
    नहीं लिख पाया कुछ मीठे शब्द
    हमने बोले कुछ प्यार के
    तो बोले भी बहुत
    पर कोई यकीन नहीं करता
    सभी ढूंढते हैं खुशी उधार की
    …………………..

  6. mehek said,

    मई 31, 2008 at 4:14 अपराह्न

    aap sabhi ka tahe dil se shukrana

  7. balkishan said,

    मई 31, 2008 at 5:16 अपराह्न

    भावपूर्ण कविता.
    आभार.

  8. मई 31, 2008 at 5:35 अपराह्न

    बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति. बधाई.

  9. जून 1, 2008 at 7:49 पूर्वाह्न

    bahut khoob

    निर्विकार उत्तर ‘मनी ऑर्डर है,चिट्ठी नही ‘

  10. Rewa Smriti said,

    जून 2, 2008 at 5:46 अपराह्न

    बेबस झुरियों के भाव शांत हो जाते
    मगर,नीर रुकते नही,आस थमती नही

    Great expression…..

  11. ROHIT said,

    जून 2, 2008 at 8:06 अपराह्न

    well mehak
    dakia bite dino ki baat ho gaya hai, theek hai
    mobile ka jamana, hai, theekhai
    per ab intzaar ka roop badal gaya hai
    ab bhoodi ankho ke badle kanno ne lieya hai
    mobile ki ghante ka jisko rahta hai intzaar
    koi hall chall to puch le, sub videsh ja pade hai
    chand baate to ho le, per kismat ab bhi nai badle
    bache ab badal gaya he, baato ki jagha sunti hai
    mobile per machine ki rati-raati awaz..
    is root ke sabhi line vyste hai….kirpya thodi dare baad dayal kare
    root ka pata nahi, bache ab bade hai, vyste hai,
    thoodi se deera lambi na anntheen intzaar me badal jaati hai
    mobile per ab bazata hai,..
    network se sampark nahi ho raha hai, kirpa thodi dere baad dayal kare
    network ka to pata nahi, ab- baccho ke pyare ka network badal gaya hai
    thodi der baad kia, ab to na khatam hone wali der ka intzaar hoga

    rohit

    yaar mehak
    dakia badal gaya hai , mobile se admi mobile ho gaya hai
    maa-baap se door ho gaya hai


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