अपना समझ के

बहुत कुछ कह देते है आपको हम अपना समझ के
ख़ता गर हुई कोई कभी माफ़ करना नादान समझ के
लफ़्ज़ों और जज़्बातों का ताल मेल बिखर जाए जो
सहना भी मुस्कुराना भी तुम हमे अनजान समझ के |

15 टिप्पणियाँ

  1. pallavi said,

    जून 7, 2008 at 7:13 अपराह्न

    very nice….

  2. abrar said,

    जून 7, 2008 at 7:19 अपराह्न

    बचपन के भावों से लबरेज चार लाइनें।
    छोटेपन का भाव लिए बडप्पन से भरी चार लाइनें।।
    बधाई। बहुत सुंदर

  3. alpana said,

    जून 7, 2008 at 9:36 अपराह्न

    bahut achcha likha..dil se seedha kagaz par utar aaye hain shabd..

  4. जून 8, 2008 at 12:30 पूर्वाह्न

    बहुत बढ़िया. मुस्करा दिये.🙂

  5. mehek said,

    जून 8, 2008 at 4:04 पूर्वाह्न

    pallavi ji,abrar ji,gauravji,alpanaji,samir ji,bahut shukrana:)

  6. जून 8, 2008 at 5:13 पूर्वाह्न

    एहसास है यह दिल के ,बिखरेंगे गीत बन के
    लिखा कभी जो भी तुमने ,पढेंगे हम हंस के🙂

  7. anurag arya said,

    जून 8, 2008 at 5:38 पूर्वाह्न

    लफ़्ज़ों और जज़्बातों का ताल मेल बिखर जाए जो
    सहना भी मुस्कुराना भी तुम हमे अनजान समझ के |

    kya baat hai..

  8. Tarun said,

    जून 8, 2008 at 8:50 पूर्वाह्न

    chhota hai magar vajandaar hai ..

    -tarun

  9. balkishan said,

    जून 8, 2008 at 10:30 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर भाव.
    एकदम सच.
    आभार.

  10. Rewa Smriti said,

    जून 8, 2008 at 1:12 अपराह्न

    Beautiful Mehek!
    kuch shabd mere taraf se abhi-abhi likha hai🙂

    “जज़्बातों की महफ़िल है, रखना कदम संभाल के
    शब्‍द बिखर ना जाए कहीं आँसुओं की मोती बनके”

  11. जून 8, 2008 at 3:26 अपराह्न

    जिनको अपना समझकर सच कहा
    वह बेगाना समझने लगे
    जब तक उनकी लापरवाह अदाओं पर
    खामोश रहे
    उनको हम अच्छे लगे
    जो एक बार किया इशारा
    उनको संभल जाने का
    तब से मूंह फेरकर वह जाने लगे
    अजनबियों जैसे हो गये अब
    गैरों की तरह मिलने लगे
    सोचते हैं हमने सच कहकर क्या गलत किया
    गलत राह पर चलने के खतरे
    होते है बहुत
    अगर हमने उनको आगाह किया तो
    क्या बुरा किया
    वह चले जा रहे हैं फिर भी
    बस हम से संभलकर चलने लगे
    …………………………………………………….
    महक जी
    आपकी इस कविता पर मुझे यह पंक्तियां लिखने का मन कर रहा हैं। बहुत गूढ़ अर्थों वाली बात अपने बहुत संक्षिप्त में कही।
    दीपक भारतदीप

  12. जून 8, 2008 at 9:42 अपराह्न

    लफ़्ज़ों और जज़्बातों का ताल मेल बिखर जाए जो
    सहना भी मुस्कुराना भी तुम हमे अनजान समझ के

    बहुत सुंन्दर

  13. mehhekk said,

    जून 9, 2008 at 4:04 पूर्वाह्न

    ranju ji bahut shukrana:)

    doc saab aapki bhi shukrana

    tarun ji,balkishan ji,vikram ji tahe dil se shukrana

    deepak ji itni khubsurat panktiyon ke liye bahut shukrana
    सोचते हैं हमने सच कहकर क्या गलत किया
    गलत राह पर चलने के खतरे
    होते है बहुत
    अगर हमने उनको आगाह किया तो
    क्या बुरा किया
    वह चले जा रहे हैं फिर भी
    बस हम से संभलकर चलने लगे bahut khub sahi kaha

    rews aapka bhi bahut shukranaजज़्बातों की महफ़िल है, रखना कदम संभाल के
    शब्‍द बिखर ना जाए कहीं आँसुओं की मोती बनके”
    bilkul ji khayal rakhenge hum,jazbaton ki mehfil mein sambhalkar hi rehenge,
    arz hai
    in aansuon ko beh jane diya karo ankhiyon ke raastein
    jazbbaton ke samandar ka toofan tumhe hi baha na de

  14. mamta said,

    जून 9, 2008 at 7:02 पूर्वाह्न

    वाह !

    छोटी और खूबसूरत।


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