अभिलाषा

गर्भ कोष की गहराई में
एक बीज आकार ले रहा
हौले हौले जोड़ रहा है
सवेदना की पंखुड़ियों को
खूबसूरत कली पर अपनी
किसी की नज़र न पड़े
इसलिए अंधेरे के जाल बुनता है
पता नही कैसे खबर मिलती है
उनको,शायद महक पहुँचती होगी
झुंड में आजाते है मिलकर
नोचने ,खरोचने को
असंख्य वेदना,दबी चीख
और लहू के  नदी बहती है
खून की होली खेलने का आनंद
हर चेहरे पर साफ लिखा
गर्भ खामोश,एक सिसकी भीं
नही भर सकता,
एक ही अभिलाषा थी  मन में
उसका फूल खिलता,
पूरे जहाँ को चमन बनाता
वो लहू का लाल रंग ही
अनगिनत खुशिया लाता
मगर उसने सोच लिया है अब
और नही ज़ुल्म सहेना
बंद कर लिए है अपने दरवाज़े
तब तक नही खुलेंगे
जब तक अपनी बेजान पंखुड़ियों को
जीवन दान देकर सशक्त चमन का
निर्माण न कर ले….

10 टिप्पणियाँ

  1. ila said,

    जून 7, 2008 at 5:11 पूर्वाह्न

    मर्मस्पर्शी भाव को कविता में इतनी खूबसूरती से ढालने के लिये महक को बधाई.

  2. जून 7, 2008 at 5:41 पूर्वाह्न

    बहुत पहले ऐसी ही एक कविता लिखी थी मैंने नन्ही कली मुरझाई ..इसको पढ़ कर वह याद आगयी ..होगी अभी भी मेरे ब्लॉग मैं कहीं ..सच है आपकी कविता आज भी कोख में कब्र दे दी जाती है और सपने टूट जाते हैं .एक सार्थक रचना महक जी ..

  3. जून 7, 2008 at 11:28 पूर्वाह्न

    जब तक अपनी बेजान पंखुड़ियों को
    जीवन दान देकर सशक्त चमन का
    निर्माण न कर ले….
    —————————–
    महक जी आपकी इस मर्मस्पर्शी और गूढ़ अर्थों वाली कविता पर मुझे यह कविता कहने का मन करता है।

    महकने देना यह चमन
    कलियों को फूल बनने देना
    बिखरेगी जब चारों तरफ सुगंध
    तुम भी आनंद विभोर हो लेना
    डर का साया हो अगर तुम्हारे दिल पर
    तो उसे भी सहेज लेना
    अमन के दुश्मन बहुत हैं
    चमन को उजाड़ दें
    ऐसे उल्लू भी अमूमन बहुत हैं
    पर हवायें जिन्हें बहलाकर
    जल उन्हें नहलाकर
    सूरज उनको सहलाकर
    देते हैं इस धरती को उपहार
    जिससे बिखर जाती है खुशबू चारों ओर
    ऐसे फूलों को ही जीवन देना
    ओ, बाग के माली!
    भले ही तेरे इस बाग में
    खिले हुए फूलों की खुशबू से
    जमाना महकता हो
    तेरा नाम लेकर कोई नहीं चहकता हो
    पर तू और तेरा रब सच जानता है
    यह बात समझ लेना
    …………………..
    दीपक भारतदीप

  4. mehek said,

    जून 7, 2008 at 2:16 अपराह्न

    ila ji ranju ji,deepakji bahut shukrana

    deepakji itani sundar aashavadi shabdon ki kavita ke liye bahut shukrana

  5. जून 7, 2008 at 4:19 अपराह्न

    बहुत मर्मस्पर्शी रचना. बड़ी खूबसूरती से भावों को शब्द दिये हैं, बधाई.

  6. rohit said,

    जून 7, 2008 at 5:52 अपराह्न

    ek hi saath, chingari or abhilasha ….mehak ..mehak bikherti rahana….kalam chalti rahna…dhodharri talwal nahi ho, ek hi dil me dho baate hai…..
    rohit

  7. anurag arya said,

    जून 8, 2008 at 6:10 पूर्वाह्न

    shayad kisi vaqt aapne kuch mahsoos kiya aor use lafzo ke jariye utaar diya…par aapne is marm ko saamjha uske liye ek achha insan hona jaroori hai.

  8. Rewa Smriti said,

    जून 8, 2008 at 1:22 अपराह्न

    kya bolun….
    ab to…
    shabd bhi…
    khamosh pade hein!

    rgds.

  9. Shubhashish Pandey said,

    जून 8, 2008 at 2:07 अपराह्न

    kafi alag ahsas liye hue hai ye kavita
    kinhi aur he bhavon se sparsh kara deti hai

  10. mehhekk said,

    जून 9, 2008 at 4:06 पूर्वाह्न

    samir ji,rohit ji,anuragji,rews,shubhashish ji aap sabhi ka shukrana


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